शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यं हि धर्मं चरन्तीह प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
यं हि न व्यथय़न्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यं हि वैद्याः कुले जाता अवृत्तिभय़पीडिताः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५
दुर्योधन उवाच
यं हि सेनाप्रणेतारं भवान्वक्ष्यति संय़ुगे |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
यं हित्वा देवताः सर्वा हव्यकव्यभुजोऽभवन् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१३२
लोमश उवाच
यः कथ्यते मन्त्रविदग्र्यवुद्धि; रौद्दालकिः श्वेतकेतुः पृथिव्याम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
यः कलां षोडशीं त्वत्तो नार्हते तं प्रशंससि ||
१६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः कलिङ्गान्समापेदे पाञ्चालो युद्धदुर्मदः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
यः कल्याणगुणाञ्ज्ञातीन्द्वेषान्नैवाभिमन्यते |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
यः कल्याणगुणाञ्ज्ञातीन्मोहाल्लोभाद्दिदृक्षते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
यः कश्चिज्जनय़ेदर्थं राज्ञा रक्ष्यः स मानवः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
यः कश्चिदिह लोके च ह्यागमः सम्प्रकीर्तितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यः कश्चिद्धर्मसमय़ात्प्रच्युतोऽधर्ममास्थितः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
यः कश्चिद्विजय़ेद्भूमिं व्राह्मणाय़ निवेदय़ेत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यः कश्चिन्न्याय़्य आचारः सर्वं शास्त्रमिति श्रुतिः |
५४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
यः काममन्यू प्रजहाति राजा; पात्रे प्रतिष्ठापय़ते धनं च |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
यः कामान्प्राप्नुय़ात्सर्वान्यश्चैनान्केवलांस्त्यजेत् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
यः कार्मुकाग्र्यं कृतवानधिज्यं; लक्ष्यं च तत्पातितवान्पृथिव्याम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
यः कालो हि व्यतिक्रामेत्पुरुषं कालकाङ्क्षिणम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
यः कालय़वनः ख्यातो गर्गतेजोभिसंवृतः |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः काशीनङ्गमगधान्कलिङ्गांश्च युधाजय़त् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
यः किम्पुरुषसिंहस्य गन्धमादनवासिनः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
यः कुञ्जराणामधिकं सहस्रं; हत्वानदत्तुमुलं सिंहनादम् ||
७४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
यः कृतस्तेऽद्य समय़ः सफलं तं कुरुष्व मे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यः कृशाश्वः कृशगवः कृशभृत्यः कृशातिथिः |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः कृष्णसदृशो वीर्ये युधिष्ठिरसमो दमे |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
यः कोपय़ति निर्दोषं सदोषोऽभ्यन्तरं जनम् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
यः क्रोधमोहौ त्यजति तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यः क्षुद्भय़ाद्वै न विकर्म कुर्या; न्मृदुर्दान्तश्चातिथेय़श्च नित्यम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
यः खड्गय़ोधी लघुचित्रहस्तो; महांश्च धीमान्सहदेवोऽद्वितीय़ः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
यः पञ्चाभ्यन्तराञ्शत्रूनविजित्य मतिक्षय़ान् |
६५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यः पठेत शुचिर्भूत्वा व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |
१७१ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
यः पठेत्कल्यमुत्थाय़ सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
१०१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
यः परित्यजते मर्त्यो लोकतन्त्रमसारवत् |
५९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७४
शुक्र उवाच
यः परेषां नरो नित्यमतिवादांस्तितिक्षति |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यः पर्युपासीत्प्रदिशो दिशश्च; त्वां सूतपुत्रः समरे परीप्सन् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
यः पश्यति नरो देवाञ्जाग्रद्वा शय़ितोऽपि वा |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
यः पश्यति सदा युक्तो यथावन्मुक्त एव सः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
यः पश्यति सुखी तुष्टो नपश्यंश्च विहन्यते |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
यः पश्यन्मां मर्षय़ति वध्यमानामनागसम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यः पाण्डवानेकरथेन वीरः; समुत्सहत्यप्रधृष्यान्विजेतुम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
यः पाण्डवाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्यां; जघन्यजाभ्यां प्रय़ुय़ुत्ससे त्वम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
यः पाण्डवीं श्रिय़ं त्यक्त्वा गतोऽद्य यमसादनम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
यः पाण्डुं धृतराष्ट्रं च विदुरं चाप्यजीजनत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
यः पापं कुरुते राजा काममोहवलात्कृतः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
वृहस्पतिरु उवाच
यः पापं पुरुषः कृत्वा कल्याणमभिपद्यते ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
मतङ्ग उवाच
यः पापेभ्यः पापतमस्तेषामधम एव सः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यः पापैः सह सम्वन्धान्मुच्यते शपथादिति ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
यः पार्थिवानेकरथेन वीरो; दिशं प्रतीचीं प्रति युद्धशौण्डः |
१९ क