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वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
यथा यय़ातिः कौन्तेय़ तथा त्वमपि पाण्डव ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
नारद उवाच
यथा यय़ातिर्धर्मात्मा यथा राजा पुरूरवाः |
१०८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
यथा यय़ावर्जुनस्य मनोभिप्राय़शीघ्रगः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन गुरुस्त्रिय़ः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यथा रक्षा कृता पूर्वं विपुलेन महात्मना ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४१
द्रोण उवाच
यथा रथस्य निर्घोषो यथा शङ्ख उदीर्यते |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा रथास्तथा नागा वद्धकक्ष्याः स्वलङ्कृताः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १३२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा रमेरन्विश्रव्धा नगरे वारणावते |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
यथा राजकुलं प्राप्य चरन्प्रेष्यो न रिष्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
युधिष्ठिर उवाच
यथा राजन्न मुह्येत शत्रुभिः परिवारितः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा राजन्प्रजाः सर्वाः सूर्यः पाति गभस्तिभिः |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
यथा राजन्हस्तिपदे पदानि; संलीय़न्ते सर्वसत्त्वोद्भवानि |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
यथा राजा च कर्ता च स्यातां कर्मणि भागिनौ |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
यथा राज्ञः क्रोधदीप्तस्य सूत; मन्योरहं भीततरः सदैव ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११३
भीष्म उवाच
यथा राज्ञेह कर्तव्यं यच्च कृत्वा सुखी भवेत् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
नल उवाच
यथा राज्यं पितुस्ते तत्तथा मम न संशय़ः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतय़ुगेऽभवत् ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
यथा राज्यात्परिभ्रष्टो वसामि वसतीरिमाः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
यथा रात्रिक्षय़े राजञ्ज्योतींष्यस्तगिरिं प्रति |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
यथा रामानुजेनाजौ रावणिर्लक्ष्मणेन वै ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
यथा रामो वाणजालाभितप्त; स्तथैवाहं सुभृशं गाढविद्धः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यथा रुचिं नावलिहेद्देवेन्द्रो भृगुसत्तम |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
यथा रुद्रश्च रुद्राण्यां यथा वेद्यां पितामहः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २०७
युधिष्ठिर उवाच
यथा रुद्राच्च सम्भूतो गङ्गाय़ां कृत्तिकासु च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
यथा रुरुः शृङ्गमथो पुराणं; हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथावत् |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
यथा रुरूणां यूथेषु सिंहो जातवलश्चरेत् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
यथा रूपं परं विष्णोर्हिरण्यकशिपोर्वधे ||
१४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
यथा लवणमम्भोभिराप्लुतं प्रविलीय़ते |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
यथा लव्धोपपन्नार्थस्तथा कौसल्य रंस्यसे |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
यथा लोकः समुच्छेदं नाय़ं गच्छेत भारत ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
यथा वः संय़ुगे सर्वान्न हन्याद्रुक्मवाहनः ||
६८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
कृप उवाच
यथा वः संय़ुगे सर्वान्न हन्याद्रुक्मवाहनः ||
११० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
यथा वः सम्प्रतिज्ञातं तत्सर्वं क्रिय़तामिति ||
५ ग
आदि पर्व
अध्याय १९९
युधिष्ठिर उवाच
यथा वक्ष्यसि नः प्रीत्या करिष्यामस्तथा वय़म् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
यथा वज्रधरः पूर्वं सङ्ग्रामे तारकामय़े ||
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वज्रेण वै दीर्णं पर्वतस्य महच्छिरः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वदत्येष विहीनय़ोनिः; शालावृको वाममुपेत्य पार्श्वम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय २८२
माण्डव्य उवाच
यथा वदन्ति शान्ताय़ां दिशि वै मृगपक्षिणः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वदसि गोविन्द सर्वं तदुपपद्यते |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
यथा वदसि दुर्धर्ष कौन्तेय़ोऽहं न सूतजः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
धृतराष्ट्र उवाच
यथा वदसि मे सूत एकस्य वहुभिः सह |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वदसि राजेन्द्र सर्वमेतत्तथा विभो |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ११२
ऋश्यशृङ्ग उवाच
यथा वनं माधवमासि मध्ये; समीरितं श्वसनेनाभिवाति |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
यथा वनगजो राजन्मृद्नंश्चरति पद्मिनीम् ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यथा वनान्ते वनपैर्विसृष्टः; कक्षं दहेत्कृष्णगतिः सघोषः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
यथा वप्रे वेगवति सर्वतःसम्प्लुतोदके |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
धृतराष्ट्र उवाच
यथा वराहस्य शुनश्च युध्यतो; स्तय़ोरभावे श्वपचस्य लाभः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वर्षति पर्जन्ये विद्युद्विभ्राजते दिवि |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
यथा वर्हाणि चित्राणि विभर्ति भुजगाशनः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
यथा वलं क्रिय़ाहीनं क्रिय़ा वा वलवर्जिता |
२० क