अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
यत्र तत्र समुत्पन्नो गुणाय़ैवोपकल्पते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
यत्र तत्रानुमानेऽस्ति कृतं भावय़तेऽपि वा |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
यत्र तत्राभिषेकेण युज्यते ज्ञातिवर्धनः ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
यत्र तद्व्यसनं प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहैः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
यत्र तद्व्रह्म निर्द्वन्द्वं यत्र सोमः सहाग्निना |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
यत्र तद्व्रह्म परममव्यक्तमजरं ध्रुवम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र तप्तं तपो घोरमार्ष्टिषेणेन भारत |
२२ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र ताः प्राणदन्भेर्यो दिव्यपुष्पावचूर्णिताः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१०८
लोमश उवाच
यत्र तानि शरीराणि सागराणां महात्मनाम् |
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र तान्क्षत्रिय़ाञ्शूरान्दिष्टान्ताननिवर्तिनः |
१९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
यत्र तिष्ठति पार्थोऽसौ जय़द्रथवधोद्यतः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यत्र तीर्णो महाराज रामो दाशरथिः पुरा ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र तीर्थानि देवानां सुपुण्यानि पृथक्पृथक् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
यत्र ते परमेष्वासा यत्ता रक्षन्ति सैन्धवम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र ते पुरुषव्याघ्रा भ्रातरोऽस्य निपातिताः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शस्त्रस्पर्शसहा युधि |
२२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शोकदुःखविनाशनाः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
यत्र ते पृथिवीपाला निहताः स्वर्गमावसन् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
यत्र ते वहवस्तात कुरवः पर्यवस्थिताः |
१७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
यत्र ते स मम स्वर्गो नाय़ं स्वर्गो मतो मम ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
यत्र ते संशय़ो राजन्न्यस्तशस्त्रे गुरौ हते |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र तेपे तपस्तीव्रं दाल्भ्यो वक इति श्रुतिः ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
यत्र तौ पुरुषव्याघ्रौ पितापुत्रौ परन्तपौ |
७५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र त्रय़ोदश समा वने वन्येन जीवसि |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
यत्र त्वं केशवे नाथे सङ्ग्रामेऽनाथवद्धतः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यत्र त्वं तादृशो भूत्वा धर्ममद्यानुपश्यसि ||
२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यत्र त्वं पुरुषव्याघ्र शेषे पांसुषु रूषितः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
यत्र त्वं वदसे साधो भवान्भवतु सत्यवाक् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
यत्र त्वां पुरुषव्याघ्रमतिक्रान्तास्त्रय़ो रथाः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दण्डः सुविहितश्चरत्यरिविनाशनः ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय़्यं भवति प्रभो ||
८ ग
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दाल्भ्यो वको राजन्पश्वर्थं सुमहातपाः |
१ ख
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दिव्यानभिप्राय़ान्पश्येम विहितांस्त्वय़ा |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोऽव्रवीदिदम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
यत्र दुर्जन इत्याह दुर्जनः सज्जनं स्वय़म् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ||
७० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दुर्योधनः कृष्ण मुहूर्तमपि जीवति ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र दुर्योधनः पापः सौवलेय़ेन पालितः |
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र दूतं महाराजो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ||
१४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
यत्र दृश्येत मुञ्चन्वै प्राणान्मैथिलसत्तम |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र देववनं रम्यं तापसैरुपशोभितम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र देवाः सदा राजन्फलकीवनमाश्रिताः |
७२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र देवाः समागम्य वासुकिं पन्नगोत्तमम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
यत्र देवाः समाय़ान्ति विशाला यत्र भारत ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यत्र देवास्तपस्तप्त्वा दैत्या व्रह्मर्षय़स्तथा |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
८६
धौम्य उवाच
यत्र देवैस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१११
नारद उवाच
यत्र देवो महादेवो यत्र विष्णुः सनातनः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५०
नाग उवाच
यत्र देवो महावाहुः शाश्वतः परमोऽक्षरः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यत्र देवो महासेनो नित्यं संनिहितो नृपः ||
५७ ख