शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
यस्तु धर्मं यथाशक्ति गृहस्थो ह्यनुवर्तते |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय
५७
विदुर उवाच
यस्तु धर्मे पराश्वस्य हित्वा भर्तुः प्रिय़ाप्रिय़े |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्तु न च्यवते नित्यं यशसा वर्चसा श्रिय़ा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु नाराय़णो नाम देवदेवः सनातनः |
९० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यस्तु नावेक्षते कञ्चित्सहाय़ं विजय़े स्थितः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
यस्तु निःश्रेय़सं ज्ञात्वा ज्ञानं तत्प्रतिपद्यते |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु निःश्रेय़सं वाक्यं मोहान्न प्रतिपद्यते |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु निःश्रेय़सं श्रुत्वा प्राप्तमेवाभिपद्यते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
यस्तु नित्यं कृतमतिर्धर्ममेवाभिपद्यते |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
यस्तु नीलानुसारेण पञ्चतारेण केतुना |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६४
गन्धर्व उवाच
यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यस्तु पक्षे गते भुङ्क्ते एकभक्तं जितेन्द्रिय़ः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
यस्तु पश्येत्स्वभावेन विना भावमचेतनः |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
यस्तु पाञ्चनखे कोशे निहितश्चित्रसेवने |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
यस्तु पूर्वमभिप्रेक्ष्य पूर्वमेवाभिभाषते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
यस्तु प्रातस्तथा साय़ं भुञ्जानो नान्तरा पिवेत् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
यस्तु प्रीतिपुरोगेण चक्षुषा तात पश्यति |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
यस्तु भोगांस्त्यजेदात्मा स वै भोक्तुं व्यवस्यति ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
यस्तु भोगान्परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत् |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यस्तु मासे गते भुङ्क्ते एकभक्तं शमात्मकः |
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
यस्तु मे दैवविहितो भक्षः क्षत्रिय़पुङ्गव |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
यस्तु योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यस्तु योधः परावृत्तः सन्त्रस्तो हन्यते परैः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
यस्तु रञ्जय़ते राजा पौरजानपदान्गुणैः |
१०३ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु राजञ्शिविर्नाम दैतेय़ः परिकीर्तितः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यस्तु राजन्कृपो नाम व्रह्मर्षिरभवत्क्षितौ |
७१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
यस्तु रौद्रसमाचारः सर्वसत्त्वभय़ङ्करः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यस्तु वक्ता द्वय़ोरर्थमविरुद्धं प्रभाषते |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
यस्तु वर्षमविज्ञाय़ क्षेत्रं कृषति मानवः |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
यस्तु वर्षशतं पूर्णं तपस्तप्येत्सुदारुणम् |
५९ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
यस्तु वाचं विजानाति वहुमानमिय़ात्स वै |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
यस्तु विप्रत्वमुत्सृज्य क्षात्रं धर्मं निषेवते |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
यस्तु विश्वस्य जगतो वुद्धिमाक्रम्य तिष्ठति |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
यस्तु वेद नरो नित्यं न स भूतेषु मुह्यति ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४७
व्रह्मो उवाच
यस्तु वेद निरावाधं ज्ञानं तत्त्वविनिश्चय़ात् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
यस्तु शत्रोर्वशस्थस्य शक्तोऽपि कुरुते दय़ाम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
यस्तु शुक्लाभिजातीय़ः प्राणिघातविवर्जकः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
यस्तु शुद्धः स्वधर्मेण ज्ञानविज्ञानवाञ्शुचिः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्राह्मण उवाच
यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थितः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
यस्तु शूरतमो राजन्सेनय़ोरुभय़ोर्मतः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
यस्तु शोचति दुःखार्तः स कथं वक्तुमुत्सहेत् |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुङ्क्तेऽहन्यष्टमे नरः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
यस्तु संवत्सरं पूर्णं चतुर्थं भक्तमश्नुते |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
यस्तु संवत्सरं पूर्णमेकाहारो भवेन्नरः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते दशाहे वै गते गते |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते नवमे नवमेऽहनि |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
यस्तु संसत्सु कथय़ेद्ग्रन्थार्थं स्थूलवुद्धिमान् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८४
भीष्म उवाच
यस्तु संहरते तानि भर्तुः प्रिय़चिकीर्षय़ा |
३२ क