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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञैर्ये चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
यज्ञैश्च तपसा चैव परां सिद्धिमवाप सः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
पाण्डुरु उवाच
यज्ञैश्च देवान्प्रीणाति स्वाध्याय़तपसा मुनीन् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञैश्च विविधैस्तात कृतं पापमरिन्दम |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
यज्ञैस्तपोभिर्निय़मैर्दानैश्च विविधैस्तथा |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
भीष्म उवाच
यज्ञैस्तपोभिर्निय़मैर्व्रतैश्च; दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ||
१०६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
यज्ञो दानं तपः शौर्यं प्रजासन्तानमेव च |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
यज्ञो दानं तपो वेदाः सत्यं च द्विजसत्तम |
५७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
शौनक उवाच
यज्ञो दानं दय़ा वेदाः सत्यं च पृथिवीपते |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
यज्ञो दानमध्ययनं तपश्च; चत्वार्येतान्यन्ववेतानि सद्भिः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञो धृतिश्च धर्मश्च नित्यमार्षो विधिः स्मृतः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञो ध्रुवः पतङ्गश्च जय़त्सेनस्त्वमुच्यसे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
यज्ञो मनीषय़ा तात सर्ववर्णेषु भारत |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ||
११७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
यज्ञो यष्टव्य इत्येव यो यजत्यफलेप्सय़ा ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञो विद्या समुत्थानमसन्तोषः श्रिय़ं प्रति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
यज्ञोपगं च यत्किञ्चिद्भगवांस्तदसंशय़म् ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
यज्ञोपगानि द्रव्याणि मूर्तिमन्ति युधिष्ठिर ||
२२ ख
सभा पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञोपघाताय़ ततः सोऽमन्त्रय़त राजभिः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
यज्ञोपवीतधारणं यज्ञो धर्मक्रिय़ास्तथा |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
यज्ञोपवीती सङ्ग्रामे जनको मैथिलो यथा |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
यज्ञोपवीती स्वाध्याय़ी अलुप्तनिय़तव्रतः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्तिं समीक्ष्य च ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
यज्वनां दानशीलानां व्राह्मणानां कृतात्मनाम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
यज्वभिर्विधिनाहूतौ मखे देवाविवाश्विनौ ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
यज्वा दानपतिः क्षान्तः स्वकर्मस्थोऽभवच्छुचिः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
यज्वा दानपतिः श्रेष्ठः सर्वभूतहितप्रिय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय २७७
मार्कण्डेय़ उवाच
यज्वा दानपतिर्दक्षः पौरजानपदप्रिय़ः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
यज्वा दानरुचिः क्षान्तो वृत्ते च परमे स्थितः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
यज्वा वदान्यो मेधावी व्रह्मण्यः सत्यसङ्गरः |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यज्वानं यज्ञमाहर्तुं राजसूय़मिय़ेष सः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
यज्वानः पुत्रिणो लोक्याः कृतकृत्यास्तनुत्यजः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
यज्वानश्च तथैवान्ये निर्होमाश्च तथापरे |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
यज्वानश्चैव सिद्धाश्च ये च योगशरीरिणः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
यज्वानो जज्ञिरे शूराः प्रजावन्तो वहुश्रुताः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
यत एवंविधा विप्राः पुराणा यज्ञवाहनाः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय १९७
विदुर उवाच
यतः कृष्णस्ततस्ते स्युर्यतः कृष्णस्ततो जय़ः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
३४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जय़ः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
यतः क्षेमं ततो गन्तुं त्वय़ा तु मम न श्रुतम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५१
वासुदेव उवाच
यतः खलु परा भक्तिर्मय़ि ते पुरुषर्षभ |
१० क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः; सुरेश भूय़श्च वचो निवोध मे ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
व्राह्मण उवाच
यतः परं न विद्येत ततोऽभ्यासे भविष्यति ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १३०
दुर्योधन उवाच
यतः पुत्रस्ततो द्रोणो भविता नात्र सांशय़ः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
यतः पुमांसः प्रमदाश्च निर्मिता; स्तदैव दोषाः प्रमदासु नारद ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
यतः पुरुषशार्दूलौ पानीय़हरणे गतौ |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
युधिष्ठिर उवाच
यतः प्रभवति क्रोधः कामश्च भरतर्षभ |
१ क
वन पर्व
अध्याय २८०
द्युमत्सेन उवाच
यतः प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स्नुषा मम |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
यतः प्रवर्तते तन्त्रं यत्र च प्रतितिष्ठति |
१४ क