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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मिण्याश्चारुविक्रमाः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
यथा ते न प्रणश्येय़ुर्महाराज तथा कुरु ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
शौनक उवाच
यथा ते मत्कृते क्षेमं लभेरंस्तत्तथा कुरु |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यथा ते विदितो मोक्षस्तथेच्छाम्युपशिक्षितुम् ||
६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३६
व्रह्मो उवाच
यथा ते सुकृताँल्लोकाँल्लभन्ते पुण्यकर्मिणः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
यथा तेन पिता मह्यं पूर्वं दग्धो विषाग्निना |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
यथा तैलक्षय़ाद्दीपः प्रम्लानिमुपगच्छति |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यथा त्रसन्ति भूतानि सर्वाण्यशनिनिस्वनात् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
यथा त्रिदशलोके हि भय़मल्पेन जाय़ते ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
यथा त्रय़ाणां वर्णानां सङ्ख्यातोपश्रुतिः पुरा |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
यथा त्वं गुणनिर्देशादपराधं चिकीर्षसि ||
१३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वं भाषसे कर्ण दैवं तु वलवत्तरम् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वं भिक्षितः सद्भिर्ददास्येव न याचसे ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
यथा त्वं महदैश्वर्यं प्राप्तः परपुरञ्जय़ |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
यथा त्वं मोक्षितः कृच्छ्रात्त्वरमाणेन वै मय़ा ||
९६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
यथा त्वं वृष्णिशार्दूलेत्युक्त्वैवं विरराम सः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय ५०
वृहदश्व उवाच
यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मंस्यति कर्हिचित् ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
यथा त्वमकरोर्द्यूतमिन्द्रप्रस्थं यथाहरः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
भीष्म उवाच
यथा त्वमपि विप्रर्षे त्रैलोक्यं सचराचरम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यथा त्वमप्रभाताय़ामस्यां निशि रथोत्तमम् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वमर्हा सुश्रोणि सत्यमेतद्व्रवीमि ते ||
१८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
यथा त्वमस्मान्भजसे वर्तमानानुपप्लवे ||
६४ ख
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव; स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः |
९ क
वन पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वमेवार्हसि तेषु वृत्तिं; प्रय़ोक्तुमार्या च यथैव कुन्ती |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
यथा त्वां केशवः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वां न स्पृशेदेष दोषः कृष्ण तथा कुरु |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय २१
कीचक उवाच
यथा त्वां नावभोत्स्यन्ति गन्धर्वाः सूर्यवर्चसः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
यथा त्वां पुरुषव्याघ्र लोको दोषेण गच्छति ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
नारद उवाच
यथा त्वां प्राप्य नोत्सीदेदय़ं सङ्घस्तथा कुरु ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वादृशको मूढो व्यवस्येत्कुलपांसनः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५०
युधिष्ठिर उवाच
यथा त्विदं न विन्देय़ुर्नरा नगरवासिनः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्विदं मय़ा प्राप्तं भुजङ्गत्वमरिन्दम |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११३
धृतराष्ट्र उवाच
यथा त्वेष क्षय़ो वृत्तो ममापनय़सम्भवः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
यथा त्वय़ं सिध्यति जीवलोक; स्तत्तेऽभिधास्याम्यसुरप्रवीर ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वय़ा जिता कृष्ण रुक्मिणी भीष्मकात्मजा ||
१०२ ख
वन पर्व
अध्याय २८८
कुन्त्यु उवाच
यथा त्वय़ा नरेन्द्रेदं भाषितं व्राह्मणं प्रति ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वय़ा महाभागे मदर्थं संशितव्रते ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
यथा त्वय़ा महाराज वर्तितव्यं परन्तप ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६८
सञ्जय़ उवाच
यथा त्वय़ा हतः शूरो भगदत्तः पितुः सखा ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा त्वय़ोक्तं कल्याणि स ह्यासीदमरोपमः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
ऋचीक उवाच
यथा त्वय़ोक्तं तु वचस्तथा भद्रे भविष्यति ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तय़ा वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम् ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा तय़ो रक्षणं च मदय़न्त्याभिभाषितम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
धृतराष्ट्र उवाच
यथा तय़ोर्युद्धमभूद्यश्चासीद्विजय़ी तय़ोः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
यथा दग्ध्वा जगत्कृत्स्नं समय़े सचराचरम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
भीष्म उवाच
यथा दस्युः समर्यादः प्रेत्यभावे न नश्यति ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यथा दानं तथा भोग इति धर्मेषु निश्चय़ः |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
यथा दारान्प्रकुर्यात्स पुत्रांश्चोत्पादय़ेद्यथा |
३० क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
यथा दारुमय़ी योषा नरवीर समाहिता |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३७
व्यास उवाच
यथा दारुमय़ो हस्ती यथा चर्ममय़ो मृगः |
३९ क