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अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
यदि वः शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणं तथा |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
भीमसेन उवाच
यदि वक्षसि भित्त्वा ते न पिवेच्छोणितं रणे ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २१
स्त्र्यु उवाच
यदि वा दोषजातं त्वं परदारेषु पश्यसि |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
यदि वा द्विपदां श्रेष्ठ द्रोणं मानय़तो गुरुम् |
५५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
यदि वा धार्मिको यज्वा यदि वा पापकृत्तमः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
यदि वा न निवर्तन्ते सत्कृता यान्तु पाण्डवाः |
४७ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
यदि वा न निहंस्येनमद्येन्द्रोऽय़ं भविष्यति |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
यदि वा पुरुषव्याघ्रो यदि वा क्लैव्यधारिता ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
व्यास उवाच
यदि वा मन्यसे राजन्हठे लोकं प्रतिष्ठितम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
यदि वा वुद्धिपूर्वाणि यद्यवुद्धानि कानिचित् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाप्यनृचोऽजपः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
यदि वाग्भिः प्रय़ोगः स्यात्प्रय़ोगे पापकर्मणः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
यदि वातोपमो जीवः संश्लेषो यदि वाय़ुना |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
यदि वापि प्रसन्नासि जप्ये मे रमतां मनः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
यदि वाप्यर्थकामः स्याज्ज्ञेय़मस्य चिकीर्षितम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
यदि वाप्यस्पृशन्त्या मे स्पर्शं जानासि कञ्चन |
१७४ क
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
यदि वाप्यस्य धर्मस्य सूक्ष्मोऽपि स्याद्व्यतिक्रमः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
यदि वाप्युपपद्येत पौरुषं नाम कर्हिचित् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
यदि वाप्येकपुत्रः स्यादपुत्रो यदि वा भवेत् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
यदि वासौ समृद्धः स्याद्यदि वाप्यधनो भवेत् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
यदि वास्ति कथाय़ोगो योऽय़ं प्रश्नो मय़ेरितः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
यदि वास्य वनस्यासि देवता यदि वाप्सराः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय १९०
द्रुपद उवाच
यदि वाय़ं विहितः शङ्करेण; धर्मोऽधर्मो वा नात्र ममापराधः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
यदि विद्यामुपाश्रित्य नरः सुखमवाप्नुय़ात् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १३४
युधिष्ठिर उवाच
यदि विन्देत चाकारमस्माकं हि पुरोचनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
यदि विप्र निसृष्टं ते जप्यस्य फलमुत्तमम् |
८० क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
यदि विशति रसातलं तदग्र्यं; विय़दपि देवपुरं दितेः पुरं वा |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
यदि वीभत्सुराय़ातस्तेषां कः स्यात्पराङ्मुखः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०
शल्य उवाच
यदि वृत्रं न हन्म्यद्य वञ्चय़ित्वा महासुरम् |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यदि वेदाः प्रमाणं ते दिवसादूर्ध्वमच्युत |
२३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यदि वेदाः प्रमाणं वो जिता लोका मय़ाक्षय़ाः ||
२७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
देवा ऊचुः
यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां पुत्र माचिरम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ७१
दमय़न्त्यु उवाच
यदि वै तस्य वीरस्य वाह्वोर्नाद्याहमन्तरम् |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यदि वै तादृशा राष्ट्रे वसेय़ुस्ते द्विजोत्तमाः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
विदुर उवाच
यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि |
६३ क
विराट पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यदि वै सारथिः स स्यात्कुरून्सर्वानसंशय़म् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४६
भीष्म उवाच
यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदय़ेत् |
४ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
यदि वो मत्प्रिय़ं कार्यमेतच्छीघ्रं विधीय़ताम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
यदि व्यवसितं ह्येतद्युवय़ोर्धर्मसंहितम् |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
यदि व्युष्टामिमां रात्रिं श्वो न हन्यां जय़द्रथम् ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
यदि व्रह्मञ्शृणोष्येतच्छ्रद्दधासि च मे वचः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
यदि व्राह्मण देहस्ते निरातङ्को निरामय़ः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १२७
ऋत्विगु उवाच
यदि शक्नोषि तत्कर्तुमथ वक्ष्यामि सोमक ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११६
नारद उवाच
यदि शक्यं महाराज क्रिय़तां मा विचार्यताम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
यदि शक्यं समुत्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम् ||
६५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३९
युधिष्ठिर उवाच
यदि शक्या कुरुश्रेष्ठ रक्षा तासां कथञ्चन |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ४४
दुर्योधन उवाच
यदि शक्या विजेतुं ते तन्ममाचक्ष्व मातुल ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८४
भीष्म उवाच
यदि शक्यो मय़ा जेतुं जामदग्न्यः प्रतापवान् |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ५५
कर्ण उवाच
यदि शक्रः स्वय़ं पार्थ युध्यते तव कारणात् |
११ क