chevron_left  यैराविष्टानिarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
यैराविष्टानि भूतानि अहन्यहनि पार्थिव ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
यैरावृतमिदं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् ||
१० ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
यैरिमं व्यकरोत्सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ||
१५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
यैरिय़ं पृथिवी सर्वा घातिता कुलपांसनैः ||
१८ ग
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
यैरिय़ं सवना साद्रिः सपुरा सागराम्वरा |
१८ क
मौसल पर्व
अध्याय ७
वसुदेव उवाच
यैर्जिता भूमिपालाश्च दैत्याश्च शतशोऽर्जुन |
४ क
वन पर्व
अध्याय २१५
मार्कण्डेय़ उवाच
यैर्दृष्टा सा तदा देवी तस्या रूपेण गच्छती |
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
यैर्द्वारैश्चारय़न्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यैर्यैरुपाय़ैर्लोकश्च न चलेदार्यवर्त्मनः |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३१
नारद उवाच
यैर्लक्षणैरुपेतः स हरिरव्यक्तरूपधृक् |
३७ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
यैर्वाचः श्राविता रूक्षाः स्थितैर्दुर्योधनप्रिय़े ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
यैर्विद्धः प्रत्यविध्यत्तानेकैकं त्रिगुणैः शरैः ||
७७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २६
युधिष्ठिर उवाच
यैर्हुतानि शरीराणि हृष्टैः परमसंय़ुगे |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
यैव हि त्वं कृता धात्रा सैव हि त्वं शिखण्डिनी ||
४१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
यैश्चाभिषिक्तो भगवान्विधिना येन च प्रभुः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १६३
वसिष्ठ उवाच
यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता |
१ क
विराट पर्व
अध्याय २१
भीमसेन उवाच
यैषा नर्तनशाला वै मत्स्यराजेन कारिता |
३ क
आदि पर्व
अध्याय २५
सूत उवाच
यैषा मम महाशाखा शतय़ोजनमाय़ता |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
व्यास उवाच
यैषा वै विहिता वृत्तिः पुरस्ताद्व्रह्मणा स्वय़म् |
५ क
वन पर्व
अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच
यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवातकवचा हता ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
यैस्ताञ्जघानाशु रणे नृसिंहा; न्स कालखञ्जानसुरान्समेतान् ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
यैस्तु दुःशासनः सार्धं रथैः पूर्वं न्यवर्तत |
५५ क
वन पर्व
अध्याय २८९
वैशम्पाय़न उवाच
यैस्त्वं सीमन्तिनीः सर्वा यशसाभिभविष्यसि ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
यो गोसहस्री शतदः समां समां; यो गोशती दश दद्याच्च शक्त्या |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
यो घृतार्थी खरीक्षीरं मथेद्गन्धर्वसत्तम |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
यो जगाम परामार्तिं वृद्धो राजाम्विकासुतः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय १७५
व्राह्मणा ऊचुः
यो जातः कवची खड्गी सशरः सशरासनः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
धृतराष्ट्र उवाच
यो जातः कुण्डलाभ्यां च कवचेन सहैव च |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
यो जानन्पापतामस्य तत्प्रज्ञामनुवर्तसे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
यो जितः पञ्चवर्गेण सहजेनात्मकर्शिना |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यो जित्वा समरे वीरश्चक्रे वलिभृतः पुरा ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
यो ज्ञातिमनुगृह्णाति दरिद्रं दीनमातुरम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
यो जय़ेत रणे द्रोणं धृष्टद्युम्नादृते नृपाः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यो जय़ेत्पाण्डवान्सङ्ख्ये पालिताञ्शार्ङ्गधन्वना ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
यो दत्त्वा म्रिय़ते जन्तुः सा गौः कं तारय़िष्यति ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यो ददाति महीं सम्यग्विधिनेह द्विजातय़े ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५५
वैशम्पाय़न उवाच
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
यो ददाति सहस्राणि गवामश्वशतानि च |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
यो ददाति स्थितः स्थित्यां तादृशाय़ प्रतिग्रहम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६२
नारद उवाच
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
यो दद्यादपरिक्लिष्टमन्नमध्वनि वर्तते |
७ क
वन पर्व
अध्याय ११९
वैशम्पाय़न उवाच
यो दन्तकूरे व्यजय़न्नृदेवा; न्समागतान्दाक्षिणात्यान्महीपान् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं सदा भवेत् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
यो दिव्यानि विमानानि देवतानां चकार ह ||
२८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
यो दीर्घवाहुः क्षिप्रास्त्रो धृतिमान्सत्यविक्रमः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यो दुःखं नाभिजानाति स जल्पति महाजने ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यो दुर्जय़ो देवितव्येन सङ्ख्ये; स चित्रसेनः कुशलं तात वाच्यः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
यो दुर्लभतरं प्राप्य मानुष्यमिह वै नरः |
३४ क