उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
यदव्रुवमहं कृष्ण कटुकानि स्म पाण्डवान् |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
धृतराष्ट्र उवाच
यदव्रूतां महात्मानौ वासुदेवधनञ्जय़ौ |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यदश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
यदश्वान्पार्थगोविन्दौ मोचय़ामासतू रणे ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
यदस्तव्यमिमं शश्वन्मोहात्संस्तौषि भक्तितः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
११
विराट उवाच
यदस्ति किञ्चिन्मम वाजिवाहनं; तदस्तु सर्वं त्वदधीनमद्य वै |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
यदस्ति चान्यद्द्रविणं गृहेषु मे; त्वमेव तस्येश्वर नित्यमीश्वरः ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
यदस्त्रं वेद रामश्च तदप्यस्मिन्प्रतिष्ठितम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
यदस्त्रमस्यति द्रोणस्तदेवास्यति सात्यकिः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
यदस्माकं विभो वृत्तं पुरा वै मन्त्रनिश्चय़े |
५१ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
यदस्माभिरजानद्भिः किञ्चिदुक्तो नराधिपः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यदस्य धर्म्यं मरणं शाश्वतं लोकवर्त्म तत् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
यदस्य रुचितं कर्तुं तत्कुरुध्वमतन्द्रिताः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यदस्य वहुधा रूपं भूतं भव्यं भवत्तथा |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यदस्य वहुधा रूपं भूतभव्यभवत्स्थितम् |
८६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
यदस्य वारिजं किञ्चिदपस्तत्प्रतिपद्यते ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
यदस्य शिशुपालस्थं तेजस्तिष्ठति भारत ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
कीट उवाच
यदहं कीटतां प्राप्य सम्प्राप्तो राजपुत्रताम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
यदहं जानमानोऽपि युद्धदोषान्क्षय़ोदय़ान् ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
यदहं त्वां रणे दृष्ट्वा हतं जीवामि दुर्भगा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
कहोड उवाच
यदहं नाशकं कर्तुं तत्पुत्रः कृतवान्मम ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
यदहं प्रष्टुमिच्छामि भवन्तं कर्मणः फलम् ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
कीट उवाच
यदहं प्राप्य कीटत्वमागतो राजपुत्रताम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
यदहं मातरं क्लिष्टां सुखे दध्यामरिन्दम ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
यदहं मानुषीं योनिं सृगालः प्राप्नुय़ां पुनः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यदहं वान्धवैस्त्यक्ता वाल्ये सम्प्रति च त्वय़ा ||
७० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
यदहं वाहुमच्छैत्सं न स धर्मो विगर्हितः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
यदहं ह्याचरे कर्म घोरमेतदसंशय़म् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे |
५९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
यदहन्यत सङ्ग्रामे दिष्टमेतत्पुरातनम् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८५
धृतराष्ट्र उवाच
यदहन्यन्त सङ्ग्रामे किमन्यद्भागधेय़तः ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
यदहिंस्रं भवेत्कर्म तत्कार्यमिति विद्महे ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
यदहिंस्रं भवेत्कर्म तत्कुर्यादात्मवान्नरः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७९
वसिष्ठ उवाच
यदह्ना कुरुते पापं तस्मात्स परिमुच्यते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
यदह्ना कुरुते पापमरक्षन्भय़तः प्रजाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
यदह्ना कुरुते पुण्यं प्रजा धर्मेण पालय़न् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
यदा कर्णे हते पार्थाः सिंहनादं प्रचक्रिरे |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
यदा कर्मगुणोपेता वुद्धिर्मनसि वर्तते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यदा कामान्समीक्षेत धर्मवैतंसिकोऽनृजुः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
यदा किरीटी परवीरघाती; निघ्नन्रथस्थो द्विषतां मनांसि |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यदा कुलीनो धर्मज्ञः प्राप्नोत्यैश्वर्यमुत्तमम् |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा कृतास्त्रो द्रुपदः प्रचिन्व; ञ्शिरांसि यूनां समरे रथस्थः |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
यदा कृष्णामुपादाय़ प्राद्रवत्केकय़ैः सह |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२४२
वैशम्पाय़न उवाच
यदा क्रोधहविर्मोक्ता धार्तराष्ट्रेषु पाण्डवः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
यदा क्षिपसि वै कृष्णौ धर्मराजं च पाण्डवम् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा क्षेप्तारो धार्तराष्ट्रान्ससैन्यां; स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
यदा क्षोभं नोपय़ाति नार्तिमन्यतरस्तय़ोः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
यदा गतं वय़ो भूय़ः शिष्टमल्पतरं च नः |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा गतोद्वाहमकूजनाक्षं; सुवर्णतारं रथमातताय़ी |
२४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
यदा गन्धर्वय़ोनौ तु वर्तामि भृगुनन्दन |
१७ क