chevron_left  यदेकस्मिञ्जगत्सर्वंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
यदेकस्मिञ्जगत्सर्वं देववद्याति संनतिम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
यदेको युगपद्वीरान्समय़ोधय़दर्जुनः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
यदेको रमतेऽरण्ये यच्चाप्यल्पेन तुष्यति ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
यदेको वहुभिः सार्धं समागच्छदभीतवत् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
यदेको वहुभिः सार्धमसम्भ्रान्तमय़ुध्यत ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
यदेको वहुभिर्युद्धे समसज्जदभीतवत् ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
यदेको वारय़ामास पाण्डुसेनां दुरासदाम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
यदेको वारय़ामास मारुतोऽभ्रगणानिव |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८४
भरद्वाज उवाच
यदेतच्चातुराश्रम्यं व्रह्मर्षिविहितं पुरा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
जनक उवाच
यदेतज्जाय़तेऽपत्यं स एवाय़मिति श्रुतिः |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
यदेतत्कत्थनावाक्यं सञ्जय़ो महदव्रवीत् |
५ क
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
यदेतत्कथितं राजंस्त्वय़ा दुर्योधनं प्रति |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७९
सहदेव उवाच
यदेतत्कथितं राज्ञा धर्म एष सनातनः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
यदेतत्कुञ्जरानीकं साहस्रमनुपश्यसि |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यदेतत्परमं गुह्यं त्वत्प्रसादमय़ं विभो |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय १४२
हिडिम्वो उवाच
यदेतत्पश्यसि वनं नीलमेघनिभं महत् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २९४
व्राह्मण उवाच
यदेतत्सहजं वर्म कुण्डले च तवानघ |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
यदेतत्सहधर्मेति पूर्वमुक्तं महर्षिभिः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
नहुष उवाच
यदेतदपि नौपम्यमतो भूय़ः प्रदीय़ताम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
यदेतदुक्तं भवता वेदशास्त्रनिदर्शनम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २०५
व्राह्मण उवाच
यदेतदुक्तं भवता सर्वं सत्यमसंशय़म् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे सच्छन्दसि |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
युधिष्ठिर उवाच
यदेतद्यादृशं चैतद्यथा चैतत्प्रवर्तितम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
यदेतन्मेघसङ्काशं द्रोणानीकस्य सव्यतः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०९
भीष्म उवाच
यदेते ह्यभिजानीय़ुः कर्म तात सुपूजिताः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यदेनं कश्चिद्व्राह्मणः कञ्चिदर्थमभिय़ाचेत्तं तस्मै दद्यादय़म् |
१५ 6
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
यदेनं क्षमय़ा युक्तमशक्तं मन्यते जनः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
यदेनं क्षमय़ा युक्तमशक्तं मन्यते जनः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
यदेनं नाभ्यवर्तन्त पाञ्चालाः सृञ्जय़ैः सह ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
यदेनं शरवर्षेण वारय़ामास पार्षतम् |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
यदेनं समरे यत्ता नाप्नुवन्त परे युधि ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
यदेनं सहिताः पार्था नातिचक्रमुराहवे ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
यदेनं सहिताः पार्था नाभ्यवर्तन्त संय़ुगे ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यदेनः कुरुते किञ्चिद्राजा भूमिमवाप्नुवन् |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३२
भीष्म उवाच
यदेनमाहुः पापेन चारित्रेण विनिक्षतम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ८५
अष्टक उवाच
यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति; भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ३५
व्रह्मो उवाच
यदेलापत्रेण वचस्तदोक्तं भुजगेन ह |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यदेव कर्म केवलं स्वय़ं कृतं शुभाशुभम् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
यदेव ददतः पुण्यं तदेव प्रतिगृह्णतः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
यदेव प्रकृतं शास्त्रमविशेषेण विन्दति |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ४६
द्रोण उवाच
यदेव प्रथमं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
यदेव मानुषं भीम भवेदन्यैरलक्षितम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
यदेव मित्रं गुरुभारमावहे; त्तदेव सुस्निग्धमुदाहरेद्वुधः ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
यदेव यस्य यौतकं तदेव तत्र सोऽश्नुते ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
यदेव योगाः पश्यन्ति तत्साङ्ख्यैरपि दृश्यते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९३
वसिष्ठ उवाच
यदेव योगाः पश्यन्ति साङ्ख्यैस्तदनुगम्यते |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यदेव व्याहृतं पूर्वं भवता भूरिदक्षिण |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
यदेव शास्त्रं साङ्ख्योक्तं योगदर्शनमेव तत् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
यदेवमनुजातस्य धातारो विदधुः पुरा |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
यदेवानन्तरं कार्यं तद्भवान्कर्तुमर्हति |
४६ क