शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
शक्र उवाच
येनैषा लभ्यते प्रज्ञा येन शान्तिरवाप्यते |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
वासुदेव उवाच
येनैषामुद्धरे जिह्वां परिमृज्यानुमृज्य च ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
५३
सूत उवाच
येनोक्तं तत्र सत्राग्रे यज्ञस्य विनिवर्तनम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
येनोत्सङ्गे गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३१
शुक उवाच
येनोपाय़ेन पुरुषैस्तच्च व्याख्यातुमर्हसि ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
येनोपाय़ेन शक्येत संनिय़न्तुं चलं मनः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
येभ्यः सृजति भूतानि कालो भावप्रचोदितः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२५१
वैशम्पाय़न उवाच
येषां कुशलकामासि तेऽपि कच्चिदनामय़ाः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
येषां कृते न सत्कारमकुर्वन्मय़ि नैषधाः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
येषां कोपाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
स्त्र्यु उवाच
येषां क्रोधाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
येषां गृहेषु शिष्टानां सक्तुमन्थाशिनां सदा |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राक्षस उवाच
येषां गोव्राह्मणा रक्ष्याः प्रजा रक्ष्याश्च केकय़ |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
येषां च जगतां नाथो नाथः कृष्णो जनार्दनः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
येषां च त्वं वहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
येषां च पुरुषव्याघ्रः शार्ङ्गधन्वा व्यपाश्रय़ः |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
येषां च वहवः शूरा ज्ञातय़ो धर्मसंश्रिताः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
येषां च सात्यकिर्गोप्ता येषां गोप्ता वृकोदरः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
येषां चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात्प्रतिश्रय़ः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
येषां चान्नानि भुञ्जीत ये च स्युः शरणागताः ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२९
व्यास उवाच
येषां चैकान्तभावेन स्वभावः कारणं मतम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
येषां चोभय़तो दन्ताश्चतुर्दंष्ट्राश्च सर्वशः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
द्रौपद्यु उवाच
येषां ज्यातलनिर्घोषो विस्फूर्जितमिवाशनेः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
येषां तथा राम समारभन्ते; कार्याणि नाथाः स्वमतेन लोके |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
येषां तेषामय़ं धर्मः सानुवन्धो भविष्यति ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
येषां त्रिवर्गः कृत्येषु वर्तते नोपहीय़ते |
२० क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
येषां त्रीण्यवदातानि योनिर्विद्या च कर्म च |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
येषां दानं दीय़मानं ह्यनिष्टं; नास्तिक्यं चाप्याश्रय़न्ते ह्यपुण्याः ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
येषां दाराः प्रतीक्षन्ते पर्जन्यमिव कर्षकाः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
येषां दाराः प्रतीक्षन्ते सुवृष्टिमिव कर्षकाः |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
येषां दिव्यानि कर्माणि विक्रमस्त्याग एव च |
१८१ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
येषां दुन्दुभिनिर्घोषो ज्याघोषः श्रूय़तेऽनिशम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
येषां दुर्नीतभावेन प्राप्तास्म्यापदमुत्तमाम् ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
येषां धर्मस्तान्प्रति नास्त्यधर्म; आरट्टकान्पाञ्चनदान्धिगस्तु ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
येषां न कश्चित्त्रसति त्रसन्ति न च कस्यचित् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
येषां न वृत्तं व्यथते न योनि; र्वृत्तप्रसादेन चरन्ति धर्मम् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
येषां नाग्रभुजो विप्रा देवतातिथिवालकाः |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
येषां पक्षधरो रामो येषां मन्त्री जनार्दनः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राक्षस उवाच
येषां पुरोगमा विप्रा येषां व्रह्मवलं वलम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
येषां प्रकोपादैश्वर्यात्प्रच्युतोऽहमनिन्दिते |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
येषां भागीरथी गङ्गा मध्येनैति सरिद्वरा ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
५
विदुर उवाच
येषां भीमो वाहुशाली च योद्धा; तेषां लोके किं नु न प्राप्यमस्ति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
४६
धृतराष्ट्र उवाच
येषां भ्राता गुरुर्ज्येष्ठो विनय़े नावतिष्ठते ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
येषां मध्ये स्थितो युद्धे भ्रातृभिः परिवारितः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
येषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमय़ा निहतः सदा |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
३
सहदेव उवाच
येषां मूत्रमुपाघ्राय़ अपि वन्ध्या प्रसूय़ते ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
९
सहदेव उवाच
येषां मूत्रमुपाघ्राय़ अपि वन्ध्या प्रसूय़ते ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
येषां युद्धं दुराधर्षैः पाण्डवैः प्रत्युपस्थितम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
येषां युद्धं भीमसेनार्जुनाभ्यां; तथाश्विभ्यां वासुदेवेन चैव |
७ क