द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
ये त्वेतत्प्रतिय़ोत्स्यन्ति मनसापीह केचन |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
ये त्वेतदभ्यसूय़न्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ये त्वेते रथिनो राजन्दृश्यन्ते काञ्चनध्वजाः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ये त्वेते सुमहानागा अञ्जनस्य कुलोद्भवाः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
७४
देवय़ान्यु उवाच
ये त्वेनमभिजानन्ति वृत्तेनाभिजनेन च |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
ये त्वेवं नाभिजानन्ति रजोमोहपराय़णाः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
ये त्वेवङ्गुणजातीय़ास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
ये त्वय़ा कीर्तिता राजंस्तेभ्योऽथ व्राह्मणो वरः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
ये त्वय़ा वलदर्पाभ्यामाविष्टेन वनेचराः |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
ये त्वय़ा सुनृशंसेन दीर्घकालं प्रवासिताः |
२५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
ये दद्युर्न च याचेय़ुर्व्रह्मण्याः सत्यवादिनः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
३४
व्रह्मो उवाच
ये दन्दशूकाः क्षुद्राश्च पापचारा विषोल्वणाः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ये दम्भान्न जपन्ति स्म येषां वृत्तिश्च संवृता |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
ये दानशीला न प्रतिगृह्णते सदा; न चाप्यर्थानाददते परेभ्यः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
ये दुर्गन्धीनि सेवन्ते तथागन्धा भवन्ति ते ||
२३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
व्रह्मो उवाच
ये दोषा यादृशाश्चैव द्विजय़ज्ञोपघातके |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
ये द्रोणमभ्यवर्तन्त क्रुद्धा भीमपुरोगमाः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
ये धनादपकर्षन्ति नरं स्ववलमाश्रिताः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
ये धर्मकुशला लोके धर्मं कुर्वन्ति साधवः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
ये धर्ममनुपश्यन्तस्तूष्णीं ध्याय़न्त आसते |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये धर्ममनुवर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ये धर्ममेव प्रथमं चरन्ति; धर्मेण लव्ध्वा च धनानि काले |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२
शौनक उवाच
ये धर्मे श्रेय़सि रता विमोक्षरतय़ो जनाः ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ये न मानितमिच्छन्ति मानय़न्ति च ये परम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ये न लोभान्नय़न्त्यर्थान्राजानो रजसावृताः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
ये न सज्जन्ति कस्मिंश्चिद्वध्यन्ते ते न कर्मभिः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
ये न हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
ये नः पुरा षण्ढतिलानवोच; न्क्रूरा राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्राः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
ये नः प्राणाः शिरो ये नो ये नो योधा महावलाः |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेषां विद्यते भय़म् ||
६० ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
ये नाथवन्तो हि भवन्ति लोके; ते नात्मना कर्म समारभन्ते |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
ये नाद्रिय़न्ते गुरुमर्चनीय़ं; पापाँल्लोकांस्ते व्रजन्त्यप्रतिष्ठान् ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
ये नास्तिका निष्क्रिय़ाश्च गुरुशास्त्रातिलङ्घिनः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ये नास्त्रज्ञास्तानहं हन्मि शस्त्रै; स्तस्माल्लोकं नेह करोमि भस्मसात् ||
९७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
ये निष्क्रिय़ा नास्तिकाः श्रद्दधानाः; पापात्मान इन्द्रिय़ार्थे निविष्टाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
धृतराष्ट्र उवाच
ये नृत्तगीतकुशला जनाः सदा; ह्ययाचमानाः सहिताश्चरन्ति |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ये नैव विद्यां न तपो न दानं; न चापि मूढाः प्रजने यतन्ते |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
ये नो न वहु मन्यन्ते न प्रवर्तन्ति चापरे |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये परस्वापहर्तारः परस्वानां च नाशकाः |
६२ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
ये परार्धे हिमवतः सूर्योदय़गिरौ नृपाः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
ये पाण्डवानां समरे सहाय़ा; जितक्लमाः क्रोधविषं वमन्ति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
ये पाण्डवार्थे योत्स्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य वाहिनीम् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
ये पापा इति विख्याताः संवासे परिगर्हिताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
ये पापानि न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
ये पापानि नराः कृत्वा निरस्यन्ति व्रतैः सदा |
१०७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
ये पार्थिवा राजसभां प्रविष्टा; व्रह्मर्षय़ो ये च सभासदोऽन्ये |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
ये पुनः स्युरसम्वद्धा अनार्याः कृष्ण शत्रवः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
ये पुरस्तादभिमताः सत्त्ववन्तो मनस्विनः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जह्रुः कुरुधनानि च |
२१ क