वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रान्नपर्वता राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रानय़ामास तदा राजसूय़ं महीपते |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
यत्राभवस्तत्र भवस्तन्निवोध सुराधिप ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
यत्राभिध्यां स कुरुते तं वै निरय़मृच्छति ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्राभिमन्युं वहवो जघ्नुर्लोकमहारथाः |
१६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
यत्राभिमन्युः समरे पश्यतां वो निपातितः ||
७६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
यत्राभ्यतीतां कुरुधर्मवेलां; प्रेक्षन्ति सर्वे कुरवः सभाय़ाम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्रामुच्यन्त पार्थास्ते पञ्च कृष्णवलाश्रय़ात् |
१८२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
यत्रामृतत्वं प्राप्नोति त्यक्त्वा दुःखं सदा सुखी ||
५५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम् |
२२३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रार्या रुदती भीता पाण्डवानिदमव्रवीत् |
७९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रार्ष्टिषेणः कौरव्य व्राह्मण्यं संशितव्रतः |
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
यत्रावगाह्य पीत्वा वा नैवं श्वोमरणं तपेत् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
यत्रावध्यन्त समरे सात्वतेन महात्मना ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्रावला वलिनं यातय़न्ति; तत्र त्वाहं हस्तिनं यातय़िष्ये ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
यत्रावलो वध्यमानस्त्रातारं नाधिगच्छति |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्रावस्थामीदृशीं प्रापितोऽहं; कच्चित्त्वय़ा सोऽद्य हतः समेत्य ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
यत्रावहसितश्चासीत्प्रस्कन्दन्निव सम्भ्रमात् |
९० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
यत्राविशन्ति कल्पान्ते सर्वे व्रह्मादय़ः सुराः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
यत्राव्रवीत्सूतपुत्रः सभाय़ां; कृष्णां स्थितां श्वशुराणां समीपे |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
यत्रासते मतिमन्तो मनस्विनः; शक्रो विष्णुर्यत्र सरस्वती च |
४४ क
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रासन्नृषय़ः सिद्धाः सहस्राणि चतुर्दश ||
३० ग
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय़्यकरणो वटः |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
यत्रासौ प्रथितो लोकेष्वक्षय़्यकरणो वटः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रासौ व्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशां पते |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
यत्रास्तमितशाय़ी स्यान्निरग्निरनिकेतनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षय़ज्ञविनाशनः |
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
यत्रास्ते देवराजोऽसौ तं देशं दर्शय़स्व मे |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रास्ते स महावाहुश्छन्नः सत्रेण पाण्डवः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महामनाः ||
३४ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
यत्रास्ते सुरभिर्माता गवाममृतसम्भवा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्रास्त्रमस्त्रेण च तच्छमय़ामास फाल्गुनः ||
१८६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
यत्रास्मि भरतश्रेष्ठ योग्यः कर्मणि कर्हिचित् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रास्य कर्म तद्घोरं प्रवदन्ति मनीषिणः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रास्य नीतिरखिला प्रादुर्भूता महात्मनः |
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्रास्य मन्युरुद्भूतो येन द्यूतमकारय़त् |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
यत्रास्य रागः पतति तत्र तत्रोपजाय़ते ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्रास्य सुमहद्युद्धमभवत्सह राक्षसैः |
११३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
यत्राहं तत्र मत्कान्ता मद्विशिष्टा मदर्पणाः |
८१ क
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
यत्राय़जत कौन्तेय़ विश्वकर्मा प्रतापवान् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
११४
लोमश उवाच
यत्राय़जत धर्मोऽपि देवाञ्शरणमेत्य वै ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्राय़जत भूतात्मा पूर्वमेव पितामहः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्राय़जद्राजसूय़ेन सोमः; साक्षात्पुरा विधिवत्पार्थिवेन्द्र |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
यत्रेच्छकनिवासाश्च केचिदत्र वनौकसः ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
यत्रेच्छसि महाराज निवासं तत्र कुर्महे ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
यत्रेच्छागामिनो दान्ताः सर्वशत्रुनिषूदनाः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रेजिवानुडुपती राजसूय़ेन भारत |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१७७
युधिष्ठिर उवाच
यत्रेदानीं महासर्प संस्कृतं वृत्तमिष्यते |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
यत्रेदृशं वलं घोरं नातरद्युधि पाण्डवान् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
यत्रेन्द्रातिक्रमं चक्रे मान्धाता राजसत्तमः ||
३ ख