भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
योजनानां सहस्राणि षोडशाधः किल स्मृतः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
योजनान्ते शतद्वारं विक्रमक्रमतोरणम् |
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय
५२
सूत उवाच
योजनाय़ामविस्तारा द्विय़ोजनसमाय़ताः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९६
कर्ण उवाच
योजितावर्थमानाभ्यां सर्वकार्येष्वनन्तरौ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
योज्यास्तुष्टैर्हितै राजन्नित्यं चारैरनुष्ठिताः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
योजय़ध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
योजय़स्वेन्द्र मां क्षिप्रं कं च देशं वहामि ते |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
योजय़ामास कुशलो जवय़ुक्तान्रथे नरः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
योजय़ामास कौरव्यो युद्धकाल उपस्थिते ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
योजय़ामास चात्मानं तांश्चाप्यनुचरांस्तदा ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
योजय़ामास नवय़ा मौर्व्या गाण्डीवमोजसा ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
योजय़ामास विधिवद्धेमभाण्डविभूषितान् ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
योजय़ामास स रथं वैय़ाघ्रं शत्रुतापनम् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
योजय़ामास संहृष्टः पुनरेव रथोत्तमे ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
योजय़ित्वा तथात्मानं परं स्थानमवाप्तवान् ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
योजय़ित्वा महाराज दारुकः प्रत्युपस्थितः ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
योत्स्यते पाण्डवांस्तात प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
योत्स्यते सततं राजंस्तवार्थे कुरुसत्तम ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
योत्स्यते समरं प्राप्य स्वेन सैन्येन पालितः ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
योत्स्यते समरे तात माय़ाभिः समरप्रिय़ः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
योत्स्यते समरे राजन्विक्रान्तो रथसत्तमः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
योत्स्यतेऽमरवत्सङ्ख्ये परसैन्येषु भारत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
योत्स्यन्ति युधि विक्रम्य शत्रुभिस्तव पार्थिव |
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
योत्स्यन्ति सह राजेन्द्र हनिष्यन्ति च तान्मृधे ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
योत्स्यन्ते ते तनुं त्यक्त्वा कुन्तीपुत्रप्रिय़ेप्सय़ा ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
योत्स्यन्ते समरे तात संरव्धा इव कुञ्जराः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
योत्स्यन्ते सर्वशक्त्येति नैतदद्योपपद्यते ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
योत्स्यमानाभ्यनह्यन्त देवरूपाः प्रहारिणः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
योत्स्यसे चापि वलिभिररिभिः प्रत्युपस्थितैः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
कर्ण उवाच
योत्स्यसे त्वं मय़ा सार्धमद्य द्रक्ष्यसि मे वलम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१२०
वासुदेव उवाच
योत्स्याम विक्रम्य परांस्तदा वै; सुय़ोधनस्त्यक्ष्यति जीवलोकम् ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
द्रोण उवाच
योत्स्यामि कौरवस्यार्थे तवाशास्यो जय़ो मय़ा ||
५२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
योत्स्यामि जय़माकाङ्क्षन्नथ वा निधनं रणे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
योत्स्यामि तु तथा राजञ्शक्त्याहं परय़ा रणे |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८०
भीष्म उवाच
योत्स्ये त्वय़ा रणे राम विशिष्टेनाधिकेन च |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
योत्स्ये परमसङ्क्रुद्धस्तत्कर्म सदृशं मम ||
६१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
योत्स्ये भृशं भारत सूतपुत्र; मस्मिन्सङ्ग्रामे यदि वै दृश्यतेऽद्य ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
योत्स्येऽहं मातुलेनाद्य क्षत्रधर्मेण पार्थिवाः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
योत्स्येऽहं शत्रुभिः सार्धं जेष्यामि च वरान्वरान् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
योत्स्येऽहं सङ्गरं प्राप्य विजेष्ये च रणाजिरे ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
योद्धव्यं तु तवार्थाय़ यथा स समय़ः कृतः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
राजो उवाच
योद्धव्यं रक्षितव्यं च क्षत्रधर्मः किल द्विज |
७३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
श्रीकृष्ण उवाच
योद्धव्यं रक्षितव्यं च यष्टव्यं चानसूय़ुभिः ||
९६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
योद्धव्यमाविशान्यत्र न योद्धव्यं तु मादृशैः |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
योद्धव्यमिति तिष्ठन्तो निद्रासंसक्तलोचनाः ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
योद्धव्यमिति युध्यन्ते राजानो जय़गृद्धिनः ||
७० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सहदेव उवाच
योद्धव्ये क्व नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृप ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
योद्धा जय़श्च जेता च सर्वप्रकृतिरीश्वरः ||
३३ ख