विराट पर्व
अध्याय
६७
विराट उवाच
यत्कृत्यं मन्यसे पार्थ क्रिय़तां तदनन्तरम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
यत्कृत्यं सिन्धुराजस्य प्राप्तकालमनन्तरम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
साध्या ऊचुः
यत्कृत्वा वै पुरुषः सर्ववन्धै; र्विमुच्यते विहगेन्द्रेह शीघ्रम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृत्वामानुषं कर्म त्यजेथाः श्रिय़मुत्तमाम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
यत्कृष्णाभ्यां समेताभ्यां नापत्रपत संय़ुगे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
यत्कौरवाणामृषभादापगेय़ादनन्तरम् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
यत्क्रुद्धो वहुलाः सेनाः सर्वतः समवारय़त् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
यत्क्रोधनो यजते यद्ददाति; यद्वा तपस्तप्यति यज्जुहोति |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
यत्क्षमं ते महावाहो तदिहारव्धुमर्हसि ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्खाण्डवं दाहय़ता कृतं हि; कृष्णद्वितीय़ेन धनञ्जय़ेन |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
यत्तः संस्तम्भय़स्वैनं यत्रैषा भिद्यते चमूः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
यत्तः सदाभवच्चापि शक्रोऽमर्षसमन्वितः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
यत्तः सम्प्रापय़न्नागं रजताश्वरथं प्रति ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
यत्तच्छतसहस्रेण संमितं राष्ट्रवर्धनम् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
यत्तच्छुक्रं महज्ज्योतिर्दीप्यमानं महद्यशः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यत्तच्छूलमिति ख्यातं सर्वलोकेषु शूलिनः ||
१३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
यत्तच्छृणु महावाहो गदतो मम सर्वशः ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
यत्तच्छृणु महावाहो निखिलेन धनञ्जय़ ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्तत्कर्णः प्रत्यजानात्त्वदर्थे; नाहत्वाहं सह कृष्णेन पार्थम् |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
यत्तत्कर्णमुपाश्रित्य शकुनिं चापि सौवलम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
यत्तत्कर्णो मन्यते पारणीय़ं; युद्धे गृहीताय़ुधमर्जुनेन |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
यत्तत्कृत्स्नं लोकतन्त्रस्य धाम; वेद्यं परं वोधनीय़ं सवोद्धृ |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
जनमेजय़ उवाच
यत्तत्तदा महाव्रह्मँल्लोमशो वाक्यमव्रवीत् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तत्पदमनुद्विग्नं तन्मे वद महामते ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
यत्तत्परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
यत्तत्पूर्वमुपाकुर्वन्नस्त्रं मामव्रवीत्कृपः |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
यत्तत्पृथां वागुवाचान्तरिक्षे; सप्ताहजाते त्वय़ि मन्दवुद्धौ |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तत्प्रविश्य पार्थानां सेनां कुर्वञ्जनक्षय़म् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
व्राह्मण उवाच
यत्तत्र कृत्वा सुमहत्पुण्यं स्यात्तद्व्रवीहि मे |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
यत्तत्र वीजं वपति सा कृषिः पारलौकिकी ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
यत्तत्रापि च दुष्टात्मा कर्णोऽभ्यद्रुह्यत प्रभो |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
यत्तत्सदसदव्यक्तं स्वपित्यस्मिन्निदर्शनम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तत्सभाय़ां भीमेन मम पुत्रवधाश्रय़म् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
यत्तत्सभाय़ामाक्रम्य कृष्णां केशेष्वधर्षय़त् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
यत्तत्सर्वे पराभूय़ पर्यवारय़तार्जुनिम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
यत्तत्सूक्ष्ममविज्ञेय़मव्यक्तमचलं ध्रुवम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तत्सौगन्धिकं राजन्नाहृतं मातरिश्वना |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१
कृष्ण उवाच
यत्तत्स्वय़ं पाण्डुसुतैर्विजित्य; समाहृतं भूमिपतीन्निपीड्य |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
यत्तदक्षरमव्यक्तममृतं व्रह्म शाश्वतम् |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
यत्तदस्त्रं महाघोरं दिव्यं पाशुपतं महत् ||
१२४ ख
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
यत्तदा त्वं द्विजश्रेष्ठ तय़ोक्तो मां प्रति प्रभो |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तदा प्राविशत्पाण्डूनाचार्यः कुपितो वशी |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यत्तदा हृष्यसे मूढ ग्लहन्नक्षैः सभातले |
४७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तदाचष्ट पुत्राय़ द्रोणः परपुरञ्जय़ः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यत्तदानामय़ज्जिष्णुर्भरतानामपाय़िनाम् |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
यत्तदाश्चर्यमिति वै करिष्यामीत्युवाच ह |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
यत्तदासीन्महद्युद्धं तत्र मे सारथिर्हतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
यत्तदुक्तं महद्वाक्यं कर्मणा तद्विभाव्यताम् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्तदुग्रं तपः कृष्ण चरन्सत्यपराक्रमः |
१३ क