आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
यः पिशाचानतीवान्यान्वभूवाति स मानुषान् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यः पुत्रं काशिराजस्य वाराणस्यां महारथम् |
५६ क
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
यः पुत्राधिमसम्प्राप्य स्वर्गेच्छामकरोत्प्रिय़ाम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
प्रकृतय़ ऊचुः
यः पुत्रो गुणसम्पन्नो मातापित्रोर्हितः सदा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यः पुनः पुरुषः क्रोधं नित्यं न सहते शुभे |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
यः पुनः प्रतिमानेन त्रीँल्लोकानतिरिच्यते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
यः पुनर्वितथं व्रूय़ाद्धर्मदर्शी सभां गतः |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
यः पुमानभवत्तत्र तं स राजर्षिसत्तमः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यः पुरा विवुधैः सेन्द्रैः साहाय़्ये युद्धदुर्मदः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
यः पुरा वोध्यते सुप्तः सूतमागधवन्दिभिः |
३९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
यः पुरा हेमदण्डाभ्यां व्यजनाभ्यां स्म वीज्यते |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
यः पुरुषः स पर्जन्यः |
१७३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यः पुरुषमेधानामय़ुतमानय़त् |
१९ ग
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यः पूर्वं सुकृतं भुङ्क्ते पश्चान्निरय़मेति सः |
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः प्रतीचीं दिशं चक्रे वशे म्लेच्छगणाय़ुताम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
यः प्रतीय़ाद्रणे द्रोणं यावद्गच्छामि पाण्डवम् ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
यः प्रदर्शय़ते नित्यं न स दुःखमवाप्नुते ||
६७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षय़े |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः प्रमाणं महाराज धर्मे धर्मभृतां वरः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
यः प्रमाणमतिक्रम्य प्रतिलोमं नराधिपः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२५
भीष्म उवाच
यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक्षास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुणः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति पावकः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यः प्राचीं दिशं जिगाय़ यावत्सूर्योदय़ात् |
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यः प्रादात्काञ्चनस्तम्भं प्रासादं सर्वकाञ्चनम् |
१२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
यः प्रिय़ं कुरुते नित्यं गुणतो वसुधाधिपः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
यः प्रय़च्छति विप्रेभ्यो न स दुर्गाणि सेवते ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
यः प्रय़ाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
यः प्रय़ाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय़ः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
यः शक्तः समरे भीष्मं योधय़ेत पितामहम् |
८३ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
यः शक्रमपि वीर्येण गमय़ेद्यमसादनम् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यः शत्रुः पाण्डुपुत्राणां मच्छत्रुः स न संशय़ः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
यः शल्यं मद्रराजानमुत्क्षिप्याभ्रामय़द्वली |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यः शस्त्रभृच्छ्रेष्ठतमं पृथिव्यां; पितामहं व्याक्षिपदल्पचेताः |
४७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५५
जनमेजय़ उवाच
यः शापं दातुकामोऽभूद्विष्णवे प्रभविष्णवे ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१३६
पौरा ऊचुः
यः शुचीन्पाण्डवान्वालान्दाहय़ामास मन्त्रिणा ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यः शूरं कृतिनं युद्धे सर्वशास्त्रविशारदम् |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यः शृणोति महीपाल पर्वणीदं यतव्रतः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः स काशिपती राजा वाराणस्यां महारथः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
यः स कौरव्यदाय़ादः पाण्डुर्नाम नराधिपः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
यः स चक्रगदापाणिः पीतवासासितप्रभः |
५० क
वन पर्व
अध्याय
१३८
लोमश उवाच
यः स जानन्महातेजा वृद्धस्यैकं ममात्मजम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
यः स देवमनुष्याणां भय़मुत्पादय़िष्यति |
३२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यः स देवमनुष्येषु प्रमाणं परमं गतः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
यः स देवान्सगन्धर्वान्सय़क्षासुरपन्नगान् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
मार्कण्डेय़ उवाच
यः स देवो मय़ा दृष्टः पुरा पद्मनिभेक्षणः |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
यः स द्यूतजितां कृष्णां प्राहसत्पुरुषाधमः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
यः स धर्मः पुरा दृष्टः सद्भिः शैनेय़ शाश्वतः |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
यः स नागाय़ुतप्राणो वातरंहा वृकोदरः |
२३ क