chevron_left  यदत्रानन्तरंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
यदत्रानन्तरं कृत्यं तद्भवान्कर्तुमर्हति ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
यदत्रानन्तरं प्राप्तं प्रशाधि त्वं महाभुज ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अम्वो उवाच
यदत्रौपय़िकं कार्यं तच्चिन्तय़ितुमर्हसि ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
यदद्य निहतेनाजौ भीष्मेण जय़मिच्छता |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
धृतराष्ट्र उवाच
यदद्य पितरं श्रुत्वा निहतं मम दुर्मतेः ||
३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
यदद्याय़ं पिता प्राप्तो मम शोकप्रणाशनः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
यदधर्मेण वर्धेरन्नधर्मरुचय़ो जनाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
यदधीतं च पित्रा मे सम्यक्चैव ततो मय़ा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
यदधीतं पुरा सम्यग्द्विजश्रेष्ठ महात्मभिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
यदधीते यद्यजते यद्ददाति यदर्चति |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
युधिष्ठिर उवाच
यदध्यात्मं यतश्चैतत्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
शुक उवाच
यदध्यात्मं यथा चेदं भगवन्नृषिसत्तम ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
यदनर्थशताविष्टं शतधा न विदीर्यते ||
२३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यदनागसि पाण्डूनां परित्यागः परन्तप ||
९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
यदनुव्याजहारार्ता तदिदं समुपागतम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
यदनेन कृतं कर्म तेनाय़ं निधनं गतः |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च; यत्तेजसा तपते भानुमांश्च |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
यदन्नं यच्च पानीय़ं सम्प्रदाय़ाश्नुते नरः |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २१५
वैशम्पाय़न उवाच
यदन्नमनुरूपं मे तद्युवां सम्प्रय़च्छतम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
यदन्नो हि नरो राजंस्तदन्नास्तस्य देवताः ||
५९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
यदन्नो हि नरो राजंस्तदन्नोऽस्यातिथिः स्मृतः |
३६ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
यदन्यः पुरुषः कुर्यात्कृतं तत्सकलं मय़ा ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
यदन्यत्सुखमस्तीह तद्व्रह्मन्ननुशाधि माम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४५
जनमेजय़ उवाच
यदन्यदकरोद्विप्र तन्मे वक्तुमिहार्हसि ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
स्कन्द उवाच
यदन्यदपि मे कार्यं देव तद्वद माचिरम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७५
भगवानु उवाच
यदन्यद्दिष्टभावस्य पुरुषस्य स्वय़ङ्कृतम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यदन्यद्वेदवादेभ्यस्तदशास्त्रमिति श्रुतिः ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
यदन्यस्तस्य तत्कुर्यान्न मृष्येदिति मे मतिः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
यदन्याचरितं कर्म सर्वमन्यः प्रपद्यते ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यदन्याय़्यमशास्त्रं तदित्येषा श्रूय़ते श्रुतिः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ११
मैत्रेय़ उवाच
यदन्योन्येन ते पुत्रा विरुध्यन्ते नराधिप ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
यदन्योऽप्युक्तवानस्मान्व्राह्मणः कुरुसंसदि ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
यदन्योऽप्युक्तवान्सभ्यो व्राह्मणः कुरुसंसदि ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशय़ः |
६१ ख
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
यदपश्यं सभाय़ां त्वां राजभिः परिवारितम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यदपि तच्चक्रं द्वादशारं षट्कुमाराः परिवर्तय़न्ति ते ऋतवः षट्संवत्सरश्चक्रम् |
१७३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
यदपि ते पुरीषं भक्षितं तस्य ऋषभस्य तदमृतम् ||
१७४ ग
आदि पर्व
अध्याय ४५
शौनक उवाच
यदपृच्छत्तदा राजा मन्त्रिणो जनमेजय़ः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
यदप्यन्योऽव्रवीद्वाक्यं वाह्लीकानां विकुत्सितम् ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८१
युधिष्ठिर उवाच
यदप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
यदभिध्याम्यहं शश्वच्छुभं वा यदि वाशुभम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
यदभिप्रेतमन्यत्ते व्रूहि यावद्व्रवीम्यहम् ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
यदभ्यगच्छन्समरे पाञ्चालाः कौरवैः सह ||
४५ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
यदभ्यगान्महातेजाः पाञ्चालानपराजितः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
यदभ्यधावद्गाङ्गेय़ं शिखण्डी शत्रुतापनः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
यदभ्यवर्षत्कौन्तेय़ान्सपाञ्चालान्ससृञ्जय़ान् |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ६४
उत्तर उवाच
यदभ्रघनसङ्काशमनीकं व्यधमच्छरैः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
यदमित्रान्वशे कृत्वा क्षत्रिय़ः सुखमश्नुते ||
१२ ख