शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र राज्ञा कुवेरेण वरा लव्धाश्च पुष्कलाः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र राज्यं परित्यज्य गान्धारीसहितो नृपः |
२१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र राज्यं परित्यज्य पाण्डवाः पुरुषर्षभाः |
२३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र राज्येप्सवः शूरा वाले शस्त्रमपातय़न् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र रामप्रतीकाशः कर्णोऽहन्यत संय़ुगे ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र रामेण राजेन्द्र तरसा दीप्ततेजसा |
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यत्र रामो गतः स्वर्गं सभृत्यवलवाहनः ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र रामो महाभागो भार्गवः सुमहातपाः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र लेभे महावाहो धनाधिपतिरञ्जसा ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
यत्र वक्ष्यसि तत्र त्वां नय़िष्यामि सुराधिप ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
यत्र वक्ष्यसि विप्रर्षे तत्र यास्यति ते रथः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
यत्र वध्यो भवेद्द्रोणः सूतपुत्रश्च सानुगः |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
यत्र वाच्याः परैः सन्तः परानाहुस्तथाविधान् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२३
लोमश उवाच
यत्र वाप्यभिकामासि तं वृणीष्व सुशोभने ||
१८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
यत्र विख्यतकीर्तिः स कुरूणामृषभोऽभवत् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्पराः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यत्र विष्णुः प्रसादार्थं रुद्रमाराधय़त्पुरा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
यत्र विस्फुरमाणोष्ठो भीमः प्राह वचो महत् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
यत्र वीरौ महेष्वासौ कृष्णौ सत्यपराक्रमौ |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगाः |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र वृद्धं गुरुं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
यत्र वेदा विनिक्षिप्तास्तत्स्थानं शून्यमेव च ||
५५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
श्रीभगवानु उवाच
यत्र वेदाश्च यज्ञाश्च तपः सत्यं दमस्तथा |
७८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१११
युधिष्ठिर उवाच
यत्र वै परमं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
द्युमत्सेन उवाच
यत्र वै पापकृत्क्लेश्यो न महद्दुःखमर्छति |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
६२
शाकुनिक उवाच
यत्र वै विवदिष्येते तत्र मे वशमेष्यतः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
यत्र वै व्राह्मणाः सन्ति श्रुतवृत्तोपसंहिताः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र वैकर्तनः कर्णो राक्षसश्च घटोत्कचः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्र वैचित्रवीर्योऽसौ दग्ध एवं दवाग्निना ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र वैश्रवणो राजा गुह्यकैः सह मोदते ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
यत्र वैय़ासकिर्धीमान्योक्तुं समुपचक्रमे ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
४
सूत उवाच
यत्र व्रह्मर्षय़ः सिद्धास्त आसीना यतव्रताः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादिभिर्देवैरृषिभिश्च तपोधनैः |
१४३ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा उपासन्ते महेश्वरम् |
८९ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़ः सिद्धचारणाः |
१३१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़ः सिद्धचारणाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़श्च तपोधनाः ||
११६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़श्च तपोधनाः |
१६६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़श्च तपोधनाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़श्च तपोधनाः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो देवाः सिद्धाश्च परमर्षय़ः |
११६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
यत्र व्रह्मादय़ो युक्तास्तदक्षरमुपासते |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३
शल्य उवाच
यत्र शक्रो भय़ोद्विग्नस्तं देशमुपचक्रमुः ||
१५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्र शक्रो वर्षति सर्वकामा; न्यत्र स्त्रिय़ः कामचाराश्चरन्ति |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
यत्र शर्यातिं च्यवनो याजय़िष्य; न्सहाश्विभ्यां सोममगृह्णदेकः |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र शान्तनवं भीष्मं हतं शंससि सञ्जय़ ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र शान्तनवं हत्वा राज्यमिच्छन्ति पाण्डवाः ||
६० ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
यत्र शान्तनवो भीष्मः शेतेऽद्य निहतः परैः ||
२२ ख