आदि पर्व
अध्याय
१७०
गन्धर्व उवाच
यदा तु मृत्युरादातुं न नः शक्नोति सर्वशः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
यदा तु रुधिरेणाङ्गे परिस्पृष्टो भृगूद्वहः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
यदा तु वाससां राशिः सभामध्ये समाचितः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
यदा तु विजय़ी राजा क्षेमं राष्ट्रेऽभिसन्दधेत् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
यदा तु विविधोपाय़ैः संवृतैर्विवृतैरपि |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यदा तु विशिखैस्तीक्ष्णैर्द्रोणचापविनिःसृतैः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
यदा तु विषमीभावमाचरन्ति चराचराः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
यदा तु विषमीभावमाविशन्ति परस्परम् |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
यदा तु वुध्यतेऽऽत्मानं तदा भवति केवलः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
यदा तु हीनं नृपतिर्विद्यादात्मानमात्मना |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
यदा तूभय़तो व्यूहो भवत्याकाशमग्रतः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
यदा ते पञ्चभिः पञ्च विमुक्ता मनसा सह |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
यदा ते मोहकलिलं वुद्धिर्व्यतितरिष्यति |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
यदा ते स्युः सुमनसो लोकसंस्थार्थनिश्चय़े |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यदा तेनाभ्यनुज्ञातः स्तुवत्येव सदा भवम् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
यदा तौ निर्विकारौ तु लक्षय़ामास भार्गवः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि वै |
५७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
यदा त्वं युधि पार्थस्य सारथ्यमुपजग्मिवान् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
यदा त्वग्रस्यत रणे द्रोणपुत्रेण फल्गुनः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यदा त्वधार्मिकान्सर्वांस्तीक्ष्णैर्दण्डैर्निय़च्छति |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
यदा त्वभ्येत्य पितरं सा वै राजीवलोचना |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
यदा त्वमन्यत नृपो जातकौतूहला इति |
६ क
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
यदा त्वमन्यतागस्त्यो गार्हस्थ्ये तां क्षमामिति |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यदा त्वमीदृशं कर्म विधिनाक्रम्य कारितः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
यदा त्वमेव पृष्ठतस्त्वमग्रतो गमिष्यसि |
६४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
यदा त्वराजके राष्ट्रे न ववर्ष सुरेश्वरः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
यदा त्ववुध्यतात्मानं भक्ष्यमाणं स वै पशुः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
यदा त्वसङ्गृहीतत्वात्प्रय़ान्त्यश्वा यथासुखम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
यदा त्वस्य भवेद्वुद्धिर्धर्म्या चार्थप्रदर्शिनी |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
यदा त्वहं देवय़ोनौ वर्तामि भृगुनन्दन |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
यदा त्वाज्ञापय़त्यन्यांस्तदास्योक्ता स्वतन्त्रता |
१४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
यदा त्वामपि शोचन्तः शोच्या यास्यन्ति तां गतिम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
यदा त्वेष गुणान्सर्वान्प्राकृतानभिमन्यते |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
यदा त्वय़ा परित्यक्ता ततोऽहं भृशपीडितः ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
शर्मिष्ठो उवाच
यदा त्वय़ा वृतो राजा वृत एव तदा मय़ा |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
च्यवन उवाच
यदा त्वय़ा सभार्येण संसुप्तो न प्रवोधितः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
यदा दानरुचिर्भवति तदा धर्मो न सीदति ||
६६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यदा दिव्यं धनुरादाय़ पार्थः; प्रभासय़न्पृतनां सव्यसाची |
३२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
यदा दुःशासनेनैषा तदा मुह्याम्यहं नृप ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
६६
विराट उवाच
यदा द्यूते जिताः पार्था न प्राज्ञाय़न्त ते क्वचित् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
यदा द्रक्ष्यसि भीमेन कुञ्जरान्विनिपातितान् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
यदा द्रक्ष्यसि भूतेशं त्र्यक्षं शूलधरं शिवम् |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
यदा द्रक्ष्यसि मां कृष्ण निहतं सव्यसाचिना |
४६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे द्रोणं शान्तनवं कृपम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे भीमसेनं महावलम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे माद्रीपुत्रौ महारथौ |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रक्ष्यसि सङ्ग्रामे श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रष्टा ज्यामुखाद्वाणसङ्घा; न्गाण्डीवमुक्तान्पततः शिताग्रान् |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यदा द्रष्टा दंशितं पाण्डवार्थे; तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ||
३४ ख