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आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहय़िष्यसि |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २८९
व्राह्मण उवाच
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहय़िष्यसि |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
वृहस्पतिरु उवाच
यं यं समृद्धं पश्यसि तत्र तत्र; दुःखं सपत्नेषु समृद्धभावः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यं यं सेनाप्रणेतारं युधि कुर्वन्ति मामकाः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
यं यं स्म भजते द्रोणः पाञ्चालानां रथव्रजम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
यं यं हि ददृशे तेषां तं तं मेने नलं नृपम् ||
११ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
यं यं हि धार्तराष्ट्राणां भीमो द्रक्ष्यति संय़ुगे |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
यं यं हि समरे योधं प्रपश्यामि विशां पते |
४ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
यं यमर्थमभिप्रेप्सुः कुरुते कर्म पूरुषः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
यं यमार्छच्छरैर्द्रोणः पाण्डवानां रथव्रजम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
यं यमुद्दिश्य दीय़ेरन्देवं सुमनसः प्रभो |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यं यमेषां येन येनाभिगच्छे; रनामय़ं मद्वचनेन वाच्यः ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
यं यमेषोऽभिसङ्क्रुद्धः सङ्ग्रामेऽभिपतिष्यति |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
यं यान्तमनुय़ान्तीह सोऽय़ं द्यूतेन जीवति ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
यं योधय़न्तो राजानो नाजय़न्वारणावते |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
यं लव्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
यं लव्ध्वा परमं लाभं मन्यते नाधिकं पुनः |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यं लव्ध्वा मागधो राजा सान्त्वमानार्थगौरवैः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम |
५ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
यं लेभे वासवाद्राजा वसुस्तस्माद्वृहद्रथः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
यं विदित्वा परं वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संय़तेन्द्रिय़ाः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं विप्रसङ्घा गाय़न्ति तस्मै वेदात्मने नमः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २०६
व्याध उवाच
यं विषादोऽभिभवति विषमे समुपस्थिते |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं वृहन्तं वृहत्युक्थे यमग्नौ यं महाध्वरे |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
यं वृहस्पतिरिन्द्राय़ तदा देवासुरेऽव्रवीत् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं वै विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
यं शैव्या जनय़ामास पौराणां स हि दारकान् |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यक्पूतो भवति पाप्मनः |
६९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यं श्रुत्वाय़ं मनुष्येन्द्रः सुखदुःखातिगो भवेत् ||
१० ग
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
यं षट्सहस्रा रथिनोऽनुय़ान्ति; नागा हय़ाश्चैव पदातिनश्च |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यं सप्ततन्तुं तन्वन्ति तस्मै यज्ञात्मने नमः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
दुर्योधन उवाच
यं समाश्रित्य कौन्तेय़ा जय़न्त्यस्मान्पदे पदे ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
सहदेव उवाच
यं समाश्रित्य धर्मज्ञं स्वमंशमनुय़ुञ्ज्महे ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
धृतराष्ट्र उवाच
यं समाश्रित्य पुत्रैर्मे कृतं वैरं महारथैः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
यं समाश्रित्य युध्यन्ते क्षत्रिय़ाः क्षत्रिय़र्षभ ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१५
भीष्म उवाच
यं समासाद्य वेगेन दिशामन्तं प्रपेदिरे |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
यं साङ्ख्या गुणतत्त्वज्ञाः साङ्ख्यशास्त्रविशारदाः |
४३ क
स्त्री पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
यं सूतपुत्रं मन्यध्वं राधेय़मिति पाण्डवाः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
यं सूतपुत्रं लोकोऽय़ं राधेय़ं चाप्यमन्यत |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय १९
गान्धार्यु उवाच
यं स्म तं पर्युपासन्ते वसुं वासवय़ोषितः |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय २१
गान्धार्यु उवाच
यं स्म पाण्डवसन्त्रासान्मम पुत्रा महारथाः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यं स्म युद्धे मन्यतेऽन्यैरजेय़; मेकलव्यं नाम निषादराजम् |
७१ क
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
यं स्म राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय २१६
वैशम्पाय़न उवाच
यं स्म सोमः समारुह्य दानवानजय़त्प्रभुः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
यं हि त्वमनवद्याङ्गि नरमाय़तलोचने |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
यं हि धर्मं चरन्तीह प्रजा राज्ञा सुरक्षिताः |
११ क