chevron_left  यत्कामात्पुण्डरीकाक्षंarrow_drop_down
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
यत्कामात्पुण्डरीकाक्षं पाण्डवार्चितवानसि ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्काम्यकात्प्रव्रजितः स जिष्णु; स्तदैव ते शोकहता वभूवुः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
यत्कारणं मन्त्रविधिः प्रवृत्तो; ज्ञाने फलं यत्प्रवदन्ति विप्राः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
भीष्म उवाच
यत्कार्यं न व्यवस्यामस्तद्भवान्वक्तुमर्हति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
यत्कार्यं परमार्थार्थं तदिहैकमनाः शृणु ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
यत्कार्यं पार्थिवेनादौ पार्थिवप्रकृतेन वा ||
३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कार्यं मम युष्माभिर्व्रह्मणः सदने तदा |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१३
जनक उवाच
यत्कार्यं व्राह्मणेनेह जन्मप्रभृति तच्छृणु |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३४
भीष्म उवाच
यत्किञ्चित्कथ्यते लोके श्रूय़ते पश्यतेऽपि वा |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
यत्किञ्चित्कर्म मानुष्यं संस्थानाय़ प्रकृष्यते |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यत्किञ्चित्पुरुषः पापं कुरुते वृत्तिकर्शितः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
यत्किञ्चित्सुहृदा वाच्यं तत्सर्वं श्रावितो ह्यहम् |
३ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
युधिष्ठिर उवाच
यत्किञ्चिदनुवर्णानां प्राक्सिन्धोरपि सौवल |
५ ख
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
यत्किञ्चिदशुभं कर्म कृतं मानुषवुद्धिना ||
१२३ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
यत्किञ्चिदशुभं कर्म तत्प्रणश्यति भारत ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्किञ्चिदशुभं देहे तत्सर्वं नाशमेय़िवत् ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
वृषपर्वो उवाच
यत्किञ्चिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ७५
शुक्र उवाच
यत्किञ्चिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
यत्किञ्चिदिह लोके वै देहवद्धं विशां पते |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
यत्किञ्चिदिह वै लोके सर्वमेष्वेव तत्त्रिषु |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय २८
युधिष्ठिर उवाच
यत्किञ्चिदेतद्वित्तमस्यां पृथिव्यां; यद्देवानां त्रिदशानां परत्र |
८ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
यत्किञ्चिद्दुष्कृतं कर्म स्त्रिय़ा वा पुरुषस्य वा |
१७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
यत्किञ्चिद्व्राह्मणो व्रूय़ात्सर्वं कुर्यामिति प्रभो ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
यत्किञ्चिन्मधुसंमिश्रं तदानन्त्याय़ कल्पते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
यत्किञ्चिन्मन्यसेऽस्तीति सर्वं नास्तीति विद्धि तत् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
सौदास उवाच
यत्कीर्तय़न्सदा मर्त्यः प्राप्नुय़ात्पुण्यमुत्तमम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ५३
सूत उवाच
यत्कीर्तय़ित्वा सर्पेभ्यो न भय़ं विद्यते क्वचित् ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७४
शुक्र उवाच
यत्कुमाराः कुमार्यश्च वैरं कुर्युरचेतसः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
यत्कृच्छ्रमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृतं कुरुसिंहेन मरुत्तस्यानुकुर्वता ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
यत्कृतं तच्च मे क्षान्तं त्वं चैव क्षम पूजनि ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृतं तत्र पार्थेन तच्चकार महावलः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
यत्कृतं तत्र भीष्मेण सङ्ग्रामे जय़मिच्छता |
७४ क
वन पर्व
अध्याय २९९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृतं तात लोकेषु तच्च सर्वं श्रुतं त्वय़ा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २३६
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृतं ते महाराज सह भ्रातृभिराहवे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
यत्कृतं ते मय़ा राजंस्त्वय़ा च मम यत्कृतम् |
६३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
यत्कृतं नः प्रसुप्तानां रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः |
११६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
यत्कृतं प्राक्षुभं कर्म पापं वा तदुपाश्नुते |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
यत्कृतं भीमसेनेन दुःशासनवधे तदा |
२० ख
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
यत्कृते चासि विकृतो दुःखेन महता नल |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
यत्कृते दुःखवसतिमिमां प्राप्तास्मि शाश्वतीम् |
४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृते पृथिवी नष्टा सहय़ा सरथद्विपा |
२१ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृते पृथिवी सर्वा सुहृदो वान्धवास्तथा |
८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ६
युधिष्ठिर उवाच
यत्कृते पृथिवीपालः शेतेऽय़मतथोचितः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
यत्कृते प्रतिकुर्याद्वै न स तत्रापराध्नुय़ात् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
यत्कृते प्रतिमुच्यन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः ||
८५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७७
वैशम्पाय़न उवाच
यत्कृते वान्धवाः सर्वे मय़ा नीता यमक्षय़म् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
यत्कृतेऽहमिदं विप्राः प्रपन्ना भृशदारुणम् |
८३ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
यत्कृतेऽहमिमां प्राप्ता तेषां वर्षे चतुर्दशे |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
यत्कृत्यं धृतराष्ट्रस्य तत्करोतु नराधिपः ||
५० ख