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उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
येषां युद्धं वलवता भीमेन रणमूर्धनि ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
येषां युधिष्ठिरो नेता गोप्ता च मधुसूदनः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
येषां युधिष्ठिरो राजा कस्माद्धर्मेऽपराध्नुय़ुः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
येषां योद्धा गुडाकेशो येषां मन्त्री जनार्दनः |
२० क
वन पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
येषां योद्धा सव्यसाची कृतास्त्रो; धनुर्येषां गाण्डिवं लोकसारम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
येषां योधाः शौचमनुष्ठिताश्च; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
येषां राजाश्वमेधेन यजते दक्षिणावता |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
येषां राष्ट्रे निवसति दर्शनीय़ो; महेष्वासः शीलवान्द्रोणपुत्रः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
येषां वंशेऽभिजातस्त्वमीदृशः कुलपांसनः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
येषां वलकृता वृत्तिर्नैषामन्याभिरोचते |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
येषां वले न विस्पर्धा वले वलवतामिव |
१८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
येषां विस्मय़ते नित्यं भगवान्कर्मभिर्हरः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
येषां वृद्धश्च वालश्च सर्वः संमानमर्हति |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
येषां वृद्धाश्च वालाश्च पितृपैतामहीं धुरम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
शक्र उवाच
येषां वेदा निहिता वै गुहाय़ां; मनीषिणां सत्त्ववतां महात्मनाम् |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
येषां वै शुल्कतो निष्ठा न पाणिग्रहणात्तथा ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८४
भीष्म उवाच
येषां वैनय़िकी वुद्धिः प्रकृता चैव शोभना |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय १५
द्रौपद्यु उवाच
येषां वैरी न स्वपिति पदा भूमिमुपस्पृशन् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
येषां शास्त्रानुगा वुद्धिर्न ते मुह्यन्ति भारत ||
१८४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
येषां षड्भागहर्ता त्वमुभय़ोः शुभपापय़ोः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
येषां सङ्ख्याविधिं चैव प्रदिशामि शृणोमि च ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
येषां सांनिध्यमत्रैव कीर्तितं कुरुनन्दन ||
७९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
येषां स्वप्रत्ययः स्वर्गस्तपःस्वाध्याय़साधनः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
येषां हतानां मांसानि विक्रीणामो वय़ं द्विज |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
येषामज्ञातकल्पानि नामगोत्राणि पार्थिव |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
येषामदेय़मर्हते नास्ति किं चि; त्सर्वातिथ्याः सुप्रसादा जनाश्च ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
येषामन्यतरत्यागाच्चतुर्णां नास्ति सङ्ग्रहः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
येषामपरिमेय़ानि नामधेय़ानि सर्वशः |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
येषामभीशुहस्तः स्याद्विष्वक्सेनो रथे स्थितः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
येषामभुक्तपूर्वं ते तेषामस्मृतिरेव च ||
३० ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
येषामर्च्यतमः कृष्णस्त्वं च येषां प्रदर्शकः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
येषामर्थाश्च साध्वर्था दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
येषामर्थाय़ पापस्य धिग्जय़स्य सुहृद्वधे |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
येषामर्थाय़ युध्यन्ते न तेषां विद्यते क्षय़ः ||
४० ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
येषामर्थाय़ संय़त्तो मत्स्यराजः सहानुगः ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च |
३३ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
येषामस्ति च भोक्तव्यं ग्रहणीदोषपीडिताः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७१
भगवानु उवाच
येषामस्ति द्विधाभावो राजन्दुर्योधनं प्रति ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ५३
वृहदश्व उवाच
येषामहं लोककृतामीश्वराणां महात्मनाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
येषामात्मसमो लोको दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
येषामात्मैव भर्तव्यो नान्यः कश्चन विद्यते ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
येषामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिरः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
धृतराष्ट्र उवाच
येषामिन्द्रोऽप्यकामानां न हरेत्पृथिवीमिमाम् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
येषामुन्मत्तको ज्येष्ठः सर्वे तस्योपचारिणः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
येषु दुष्टेषु दोषः स्याद्योगक्षेमस्य भारत |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
येषु नृत्येरन्नप्सरसः सहस्रशः; स्वर्गोद्देशः क्रिय़तां यज्ञवाटः ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
येषु भारं समासज्य राज्ये मतिमकुर्महि |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
येषु येषु च भाण्डेषु भुक्तं वो द्विजसत्तमाः |
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
येषु येषु नरः पार्थ यत्र यत्र च वर्तते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
येषु येषु निमित्तेषु न लिम्पन्त्यथ तच्छृणु ||
१६ ख