भीष्म पर्व
अध्याय
४९
धृतराष्ट्र उवाच
यत्र शान्तनवो भीष्मो नातरद्युधि पाण्डवम् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र शार्ङ्गा वभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्र शीतभय़ं नास्ति न चोष्णभय़मण्वपि |
४९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
यत्र शेते नरश्रेष्ठः शरतल्पे पितामहः ||
९१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति सूनृतः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यत्र संनिहितो नित्यं स्वय़मेव हुताशनः |
७७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
यत्र संलोडिता लुव्धैः प्राय़शो धर्मसेतवः |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र संशप्तकाः पार्थमपनिन्यू रणाजिरात् ||
१६० ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र सर्वक्षय़ं कृत्वा तावुभौ रामकेशवौ |
२२२ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
यत्र सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः साक्षात्तमृषिसत्तमम् |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
यत्र सर्वान्महीपालाञ्शस्त्रतेजोभय़ार्दितान् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
यत्र सर्वे न युगपद्व्यशीर्यन्त महारथाः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्षिसेविता |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
यत्र सा वदरी रम्या ह्रदो वैहाय़सस्तथा |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१
सूत उवाच
यत्र सा विनता तस्मिन्पणितेन पराजिता |
२ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र सा वृहती श्यामा वुद्धिसत्त्वगुणान्विता |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
८८
धौम्य उवाच
यत्र सारस्वतैरिष्ट्वा गच्छन्त्यवभृथं द्विजाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
यत्र सारस्वतो राजन्सोऽङ्गिरास्तपसो निधिः |
१६४ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ||
१२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र सूक्तं दुरुक्तं च समं स्यान्मधुसूदन |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
यत्र सेनां समाश्रित्य भीतस्तिष्ठति पाण्डवात् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
१८
सूत उवाच
यत्र सोऽश्वः समुत्पन्नः श्रीमानतुलविक्रमः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यत्र सौभवधाख्यानं किर्मीरवध एव च |
१०६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
यत्र स्त्री यत्र कितवो यत्र वालोऽनुशास्ति च |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान्सुमहत्तपः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
यत्र स्थास्यति सङ्ग्रामे पार्षतः परवीरहा |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
यत्र स्नात्वा कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमवगच्छति |
१३० क
वन पर्व
अध्याय
१२९
लोमश उवाच
यत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ धूतपाप्मा भविष्यति |
२१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र स्म श्रूय़ते द्रौणिः पुत्रहन्ता महात्मनाम् ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
यत्र हर्षस्त्वय़ा कार्यः सत्कर्तव्याश्च पाण्डवाः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
यत्रक्वचनशाय़ी च तं देवा व्राह्मणं विदुः ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९७
नारद उवाच
यत्रतत्रशय़ो नित्यं येनकेनचिदाशितः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४२
सनत्सुजात उवाच
यत्राकथय़मानस्य प्रय़च्छत्यशिवं भय़म् |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
जनमेजय़ उवाच
यत्रागमदमेय़ात्मा स्वय़मेव जनार्दनः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
यत्रागमय़मानानामसत्कारेण पृच्छताम् |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
यत्राग्निय़ौनाश्च वसन्ति विप्रा; ह्ययोनय़ः पर्वतय़ोनय़श्च ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्रातिमात्रं लुव्धोऽय़ं पुत्रो दुर्योधनो मम ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय
५०
अर्जुन उवाच
यत्रातिष्ठत्कृपो राजन्योत्स्यमानो धनञ्जय़म् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रात्मतृप्तैरध्यास्ते देवैः सह पितामहः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
यत्रात्मानं न जनय़ेद्वुधस्ताः परिवर्जय़ेत् ||
४९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
शक्र उवाच
यत्राददः सहस्राणामय़ुतानि गवां दश ||
२१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यत्रादहत्स भगवान्मातरं सव्यसाचिनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
यत्राधर्मं प्रणय़ते दुर्वले वलवत्तरः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
यत्राधर्मो धर्मरूपाणि विभ्र; द्धर्मः कृत्स्नो दृश्यतेऽधर्मरूपः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
यत्राधिरथिराय़स्तो नातरत्पाण्डवं रणे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ ||
११ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
कृष्ण उवाच
यत्रानृतं भवेत्सत्यं सत्यं चाप्यनृतं भवेत् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
यत्रानृतं भवेत्सत्यं सत्यं वाप्यनृतं भवेत् ||
५ ख