शान्ति पर्व
अध्याय
७९
भीष्म उवाच
यथा दारुमय़ो हस्ती यथा चर्ममय़ो मृगः |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
यथा दाशरथी रामः खरं हत्वा महावलम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
यथा दिवि महाघोरौ राजन्वुधशनैश्चरौ ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
यथा दीपः प्रकाशात्मा ह्रस्वो वा यदि वा महान् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
यथा दीपसहस्राणि दीपान्मर्त्याः प्रकुर्वते |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
यथा दीपो निवातस्थो निरिङ्गो ज्वलतेऽच्युत |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
यथा दुर्योधनः कामं नेमं द्रोणादवाप्नुय़ात् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा दुर्योधनगृहं तथा दुःशासनस्य च |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
यथा दुर्योधनस्तात सज्ञातिकुलवान्धवः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
४६
द्रोण उवाच
यथा दुर्योधनेऽय़त्ते नागः स्पृशति सैनिकान् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
यथा दुर्योधनो वाच्यो यथा शान्तनवो नृपः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा दुहितरश्चैव प्रतिगृह्य यय़ौ कुरून् ||
४४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
यथा दृप्तं वने नागं शरभो वारय़ेद्युधि ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
१०६
लोमश उवाच
यथा दृष्टं श्रुतं चापि सागराणां क्षय़ं तथा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान्वा पिनाकधृक् |
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा दृष्टास्त्वय़ा पुत्रा यथाकामविहारिणः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
दाल्भ्य उवाच
यथा दृष्टिः प्रवृत्ता ते सावित्र्याश्च यथा व्रतम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीत्सुदारुणम् ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीद्विशां पते |
५८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे जम्भशक्रौ महावलौ ||
२७ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे त्रिदशा वज्रधारिणम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे पुरा पूषा स्म शोभते ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे महेन्द्रः प्राप्य दानवान् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे मय़वासवय़ोरभूत् ||
३४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे वज्रपाणिर्महासुरान् ||
२६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे वलशक्रौ महावलौ ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे वलशक्रौ महावलौ ||
४३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे वृत्रवासवय़ोरभूत् ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे शक्रशम्वरय़ोरिव ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे शक्रस्य सह दानवैः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४४
सञ्जय़ उवाच
यथा देवासुरे युद्धे शम्वरामरराजय़ोः ||
१८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा देवास्तथा विप्रा दक्षिणान्नमहाधनैः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
यथा देवैः स मे भर्ता विहितो निषधाधिपः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
यथा देशः स विख्यातस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
यथा दैत्यगणे विष्णुः सुरासुरनमस्कृतः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
यथा दैत्यचमूं राजन्देवराजो ममर्द ह |
४० क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
यथा दैत्यचमूं राजन्निन्द्रोपेन्द्राविवामरौ ||
५५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
यथा दैत्यचमूं शक्रस्तापय़ामास संय़ुगे |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
भीष्म उवाच
यथा दैत्येन वृत्रेण भ्रष्टैश्वर्येण चेष्टितम् ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
यथा द्रव्यं च कर्ता च संय़ोगोऽप्यनय़ोस्तथा ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
यथा द्रोणस्य पाञ्चाल्यो यज्ञसेनसुतोऽभवत् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यथा धनं लिप्समानैर्भृत्यैर्नृपतिसत्तमम् ||
७ ग
वन पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा धनञ्जय़ः पार्थस्तपस्वी निय़तव्रतः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
यथा धर्मरतिर्नित्यं नित्यं युद्धपराय़णः ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
यथा धावति गौर्वत्सं क्षीरमभ्युत्सृजन्त्युत |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् |
१६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
यथा न कश्चिदपि मे जीवन्मुच्येत मानवः ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यथा न कुर्याद्वलभिन्न चान्तको; न च प्रचेता भगवान्न यक्षराट् ||
२४ ग