उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
यो हन्तुकामस्य न पापमिच्छे; त्तस्मै देवाः स्पृहय़न्त्यागताय़ ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
यो हन्यात्पितरस्तस्य भ्रूणहत्यामवाप्नुय़ुः ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
यो हन्यात्समरे क्रुद्धो युध्यन्तमपलाय़िनम् |
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यो हन्याद्यश्च मां स्तौति तत्रापि शृणु जाजले ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
यो हि कश्चिद्द्विजं हन्याद्गां वा लोकस्य मातरम् |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
यो हि कारणतः क्रोधं सञ्जातं क्षन्तुमर्हति |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
यो हि खादति मांसानि प्राणिनां जीवितार्थिनाम् |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
यो हि तेजो यथाशक्ति न दर्शय़ति विक्रमात् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
यो हि दिष्टमुपासीनो निर्विचेष्टः सुखं स्वपेत् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
यो हि दोग्ध्रीमुपास्ते तु स नित्यं लभते पय़ः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
यो हि धर्मं चरति वै तं तु जानामि केवलम् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
यो हि धर्मं परित्यज्य भवत्यर्थपरो नरः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
यो हि धर्मं विचिनुय़ादुत्कृष्टं मतिमान्नरः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यो हि धर्मं व्यपाश्रित्य हित्वा भर्तुः प्रिय़ाप्रिय़े |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
यो हि धर्मः स विदुरो विदुरो यः स पाण्डवः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
यो हि नाभाषते किञ्चित्सततं भ्रुकुटीमुखः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यो हि पापसमारम्भे कार्ये तद्भावभावितः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
यो हि प्रश्नं न विव्रूय़ाद्धर्मदर्शी सभां गतः |
५६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
यो हि प्रीतमना नित्यं यश्च नित्यमनुव्रतः |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
यो हि भोज्ये पुरस्कार्यो यानेषु शय़नेषु च |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
यो हि मां पुरुषो गृध्येद्यथान्याः प्राकृतस्त्रिय़ः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
यो हि मित्रमविज्ञाय़ याथातथ्येन मन्दधीः |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
यो हि यं मनसा कामं दध्यौ त्रिपुरसंश्रय़ः |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
यो हि यस्मिन्रतो धर्मे स तं पूजय़ते सदा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१
देवस्थान उवाच
यो हि राज्ये स्थितः शश्वद्वशी तुल्यप्रिय़ाप्रिय़ः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
यो हि वेदे च शास्त्रे च ग्रन्थधारणतत्परः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
यो हि व्राह्मण्यमुत्सृज्य क्षत्रधर्मरतो द्विजः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११४
भीष्म उवाच
यो हि शत्रोर्विवृद्धस्य प्रभोर्वधविनाशने |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
यो हि शैनेय़ मित्रार्थे युध्यमानस्त्यजेत्तनुम् |
४८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यो हि श्रुत्वा वचः पथ्यं जामदग्न्याद्यथातथम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यो हि संहरते क्रोधं भावस्तस्य सुशोभने |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८२
पराशर उवाच
यो हृत्वा गोसहस्राणि नृपो दद्यादरक्षिता |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
यो ह्यधर्मेण विव्रूय़ाद्गृह्णीय़ाद्वाप्यधर्मतः |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
यो ह्यनस्त्रविदो हन्याद्व्रह्मास्त्रैः क्रोधमूर्छितः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३२
भीष्म उवाच
यो ह्यनाढ्यः स पतितस्तदुच्छिष्टं यदल्पकम् |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यो ह्यभ्युपगतं प्रीत्या गरीय़ांसं वशे स्थितम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यो ह्यमित्रैर्नरो नित्यं न सन्दध्यादपण्डितः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
यो ह्ययं मय़ि सङ्घातो मर्त्यत्वे पाञ्चभौतिकः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११६
युधिष्ठिर उवाच
यो ह्यसत्प्रग्रहरतिः स्नेहरागवलात्कृतः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
यो ह्यसूय़ुस्तथाय़ुक्तः सोऽवहासं निय़च्छति ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
यो ह्यसौ छद्मनाचार्यं शस्त्रं संन्यासय़त्तदा |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
वैशम्पाय़न उवाच
यो ह्यस्माकं गुरुः श्रेष्ठः कृष्णद्वैपाय़नो मुनिः |
१२३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
व्राह्मण उवाच
यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
यो ह्यस्य मुखमद्राक्षीत्सोम्य सोऽस्य वशानुगः |
१३९ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
यो ह्यस्या हर्षसम्भूतो मुखरागस्तदाभवत् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
यो ह्याजिजीविषेद्भैक्ष्यं कर्मणा नैव केनचित् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
यो ह्याद्रिय़ेद्भक्ष्यमिति श्वमांसं; मन्ये न तस्यास्ति विवर्जनीय़म् ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
यो ह्यास्ते व्राह्मणः शिष्टः स आत्मरतिरुच्यते ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
यो ह्येकः पाण्डवैर्युध्येद्यो वा युध्यन्तमुत्सृजेत् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
यो ह्येको हि महावाहुर्निर्दहेद्घोरचक्षुषा |
९ ख