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उद्योग पर्व
अध्याय ९
शल्य उवाच
यथा स सज्जेत्त्रिशिराः कामभोगेषु वै भृशम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
यथा स सत्यो भवति तथा कुरु वृषध्वज |
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
यथा स सर्वभुग्व्रह्मा तथा मां विद्धि धर्मतः ||
५१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८
शल्य उवाच
यथा स हृतदर्पश्च हृततेजाश्च पाण्डव |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
यथा संशप्तकैः सार्धमर्जुनस्याभवद्रणः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
यथा संश्रूय़ते राजन्कारणं चात्र वक्ष्यते |
८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ५
विदुर उवाच
यथा संसारगहनं वदन्ति परमर्षय़ः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
यथा संसिध्यते विप्र स मार्गस्तु निशम्यताम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
यथा संहरते जन्तून्ससर्ज च पुनः पुनः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
यथा संहृष्यते पापः पाण्डुपुत्रो वृकोदरः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
यथा सततगो राजन्नाभिहत्य परान्रणे ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सत्यं च धर्मश्च मय़ि नित्यं प्रतिष्ठितौ |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
नारद उवाच
यथा सत्येन मे धर्मो यथा सत्येन पावकः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
यथा सद्भिः परादानमहिंसा दस्युभिस्तथा |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ९९
सत्यवत्यु उवाच
यथा सद्यः प्रपद्येत देवी गर्भं तथा कुरु |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यथा समग्रं वचनं मय़ोक्तं; सहामात्यं श्रावय़ेथा नृपं तम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
भीष्म उवाच
यथा समधुरौ दम्यौ सुदान्तौ साधुवाहिनौ |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा समागमे पूर्वं कृतः स समय़स्त्वय़ा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
यथा समित्सु दग्धासु न प्रणश्यति पावकः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
यथा समुद्रमभितः संस्यूताः सरितोऽपराः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा समुद्रात्प्रसृता जलौघा; स्तमेव राजन्पुनराविशन्ति |
७७ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
यथा समुद्रो भगवान्यथा च हिमवान्गिरिः |
५२ क
आदि पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा समुद्रो भगवान्यथा च हिमवान्गिरिः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
यथा सम्भृतसम्भारः पुनरेव प्रजाय़ते |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सम्वन्धकं प्राप्य यज्ञसेन त्वय़ा सह ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३५
श्रीभगवानु उवाच
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सर्वत्र तत्सर्वं व्रूहि मेऽद्य पितामह ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
यथा सर्वरसैस्तृप्तो नाभिनन्दति किञ्चन |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
यथा सर्वश्चतुष्पादस्त्रिभिः पादैर्न तिष्ठति |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
यथा सर्वाणि भूतानि मृत्योर्भीतानि भारत |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
यथा सर्वाणि भूतानि वृष्टिर्भौमानि वर्षति |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यथा सर्वास्ववस्थासु वार्ष्णेय़ः पाति पाण्डवम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
यथा सर्वे सुमनसः सह स्यामः सुचेतसः ||
९० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
यथा सविद्युतो मेघा नदन्तो जलदागमे |
१३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
यथा सविद्युत्स्तनिता वलाहकाः; समास्थिता दिग्भ्य इवोग्रमारुतैः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
यथा सा कृच्छ्रकालेऽपि लेभे धर्मं सनातनम् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
यथा सागरय़ो राजंश्चन्द्रोदय़विवृद्धय़ोः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
यथा सार्धममित्रेण सर्वतः प्रतिवाधनम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा साह्यं पुरा दत्तं हताश्च विवुधद्विषः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सिंहस्य नदतः स्वनं श्रुत्वेतरे मृगाः |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०१
सञ्जय़ उवाच
यथा सिंहान्समासाद्य मृगाः प्राणपराय़णाः ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
यथा सिंहो वने राजन्मृगं परिवुभुक्षितः ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
यथा सिद्धस्य चान्नस्य द्विजाय़ाग्रं प्रदीय़ते |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
यथा सुखगमः पन्था भवेत्त्वद्रश्मितापितः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा सुखी जनः सर्वः क्षत्तः स्यादन्नसंय़ुतः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
यथा सुखेन गच्छेत सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
यथा सुखेन गच्छेतां जय़द्रथवधं प्रति |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
यथा सुरपतिः शक्रस्त्रासय़ामास दानवान् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु मधुसूदनः |
५५ क