द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
यथा मृगगणान्सिंहः सैन्धवार्थे व्यलोडय़त् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
यथा मृगपतिर्नित्यं प्रकाङ्क्षति वनौकसः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
यथा मृगस्य विद्धस्य मृगव्याधः पदं नय़ेत् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
यथा मृणालोऽनुगतमाशु मुञ्चति कर्दमम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
काल उवाच
यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद्यदिच्छति |
६७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
यथा मृत्युर्गृहस्थेन धर्ममाश्रित्य निर्जितः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१८३
अत्रिरु उवाच
यथा मे गौतमः प्राह ततो न व्यवसाम्यहम् ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा मे दय़ितो धर्मो व्राह्मणाश्च विशेषतः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
अर्जुन उवाच
यथा मे न वधः कार्य आचार्यस्य कथञ्चन |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
यथा मे नारदः प्राह यतः कृष्णस्ततो जय़ः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
यथा मे पुरुषाः प्राहुर्ये धनञ्जय़सारिणः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७८
राजो उवाच
यथा मे भगवानाह नारदो देवसत्कृतः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
यथा मे मनसः शान्तिः परमा सम्भवेत्प्रभो ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
यथा मे सर्वगात्राणि नस्वस्थानि हतौजसः ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
यथा मेघस्य नदतो गम्भीरं जलदागमे ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
यथा मेघैर्महाराज तपान्ते दिवि भास्करम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
यथा मेरुर्महाराज शृङ्गैरत्यर्थमुच्छ्रितैः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८२
यय़ातिरु उवाच
यथा मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
राम उवाच
यथा मय़ा परं शक्त्या कृतं वै पौरुषं महत् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा मय़ा विनिर्जित्य राजानो वशगाः कृताः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
यथा यज्ञे महानग्निर्मन्त्रपूतः प्रकाशय़न् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
यथा यथा च पर्येति लोकतन्त्रमसारवत् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा यथा त्वं मन्येथाः कुर्याः कृष्ण तथा तथा ||
१०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
यथा यथा न हीय़ेरंस्तथा कुर्यान्महीपतिः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
यथा यथा नरः सम्यगधर्ममनुभाषते |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
यथा यथा प्रविशति तस्मात्परतरं नरः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
यथा यथा भाषसि धर्मसंहितं; मनोनुकूलं सुपदं महार्थवत् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
दस्यव ऊचुः
यथा यथा वक्ष्यसि नः करिष्यामस्तथा तथा |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
यथा यथा वै जीवेद्धि तत्कर्तव्यमपीडय़ा |
६१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
यथा यथा हि जल्पन्ति दौहित्रास्तं नराधिपम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
५७
वृहदश्व उवाच
यथा यथा हि नृपतिः पुष्करेणेह जीय़ते |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
यथा यथा हि पुरुषो नित्यं शास्त्रमवेक्षते |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
यथा यथा हि युध्यन्ते योधा ह्यस्त्रवलं प्रति |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
यथा यथा हि सद्वृत्तमालम्वन्तीतरे जनाः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
यथा यथा ह्ययुध्यन्त पाण्डवानां महारथाः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
यथा यथास्य प्राप्तव्यं प्राप्नोत्येव तथा तथा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३०
भीष्म उवाच
यथा यथास्य वहतः सहाय़ाः स्युस्तथापरे ||
१४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
यथा यथाहमिच्छेय़ं तथा भूत्वा शरा मम |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७२
भीमसेन उवाच
यथा यथैव शान्तिः स्यात्कुरूणां मधुसूदन |
१ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा युक्तं वामदेवाहमेनं; दिने दिने संविशन्ती व्यशंसम् |
७९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
यथा युगक्षय़े घोरे चन्द्रमाः पञ्चभिर्ग्रहैः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
यथा युगान्ते भूतानि धक्ष्यन्निव हुताशनः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
यथा युधि जय़ेय़ं त्वां यथा राज्यं भवेन्मम |
६४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
यथा युधिष्ठिरः प्राह तत्सर्वं सत्यमेव हि ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९४
जनमेजय़ उवाच
यथा युधिष्ठिरो राजा भीमार्जुनपुरःसरः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यथा युय़ुधिरे वीराः कुरुपाण्डवसोमकाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४०
भीष्म उवाच
यथा येन च कल्पेन स तस्मै द्विजसत्तमः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
यथा येन यदा चैव प्रदेय़ा यादृशाश्च ते ||
४४ ख