उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यवीय़सस्तथा क्षत्तुः कुरुवंशविवर्धनः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
यवीय़सस्तव भ्रातुर्भार्ये सुरसुतोपमे |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
यवीय़सा नृवीरेण माद्रीनन्दिकरेण च ||
३० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
यवीय़सो माद्रवतीसुतस्य; भार्या मता चम्पकदामगौरी ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०५
वैशम्पाय़न उवाच
यवीय़सोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकः ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
यवीय़ांसं ततः पूरुं पुत्रं स्ववशवर्तिनम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
यवीय़ांसोऽभिजाय़न्ते राज्यं वृद्धोपसेवय़ा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७४
गन्धर्व उवाच
यवीय़ान्देवलस्यैष वने भ्राता तपस्यति |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
यवीय़ान्पशुहिंसाय़ां तुल्यधर्मो भवेत्स हि ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
यवीय़ान्पशुहिंसाय़ां भागार्धं समवाप्नुय़ात् ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९६
मार्कण्डेय़ उवाच
यशः कीर्तिमथैश्वर्यं प्रजा धर्मं तथैव च ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२
कर्ण उवाच
यशः परं जगति विभाव्य वर्तिता; परैर्हतो युधि शय़िताथ वा पुनः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
यशः परं प्राप्स्यसि जीवलोके; भय़ं न चामुत्र न चेह तेऽस्ति ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
यशः प्रवीरा लोकेषु रक्षन्तो द्रोणमन्वय़ुः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च |
१२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०९
भीष्म उवाच
यशः प्राप्स्यसि भद्रं ते धर्मं च सुमहाफलम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
यशः प्रार्थय़से नूनं तेनासि हरिणः कृशः ||
२८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३५
भीष्म उवाच
यशः शौर्यं जय़ं चास्य विज्ञाय़ार्चां प्रय़ुज्महे ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
यक्ष उवाच
यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२४०
दानवा ऊचुः
यशःप्रतापधैर्यघ्नीं शत्रूणां हर्षवर्धनीम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
यशश्च तेजश्च तवापि दीप्तं; विभावसोर्भास्करस्येव पार्थ ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
यशश्च धर्मश्च जय़श्च मारिष; प्रिय़ाणि सर्वाणि च तेन केतुना |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
यशश्च वो न नश्येत इति चोद्धर्षणं कृतम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
यशसः श्रेय़सश्चैव मूलं मां विद्धि कौरव |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
यशसा च परित्यक्तास्त्वां प्राप्य कुलपांसनम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
यशसा चापि युज्येय़ं निहतः सव्यसाचिना ||
२१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७
अर्जुन उवाच
यशसा चाहमप्यर्थी तस्मादसि मय़ा वृतः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
यशसा तेजसा चैव वृत्तेन च समन्वितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
यशसा पृथिवीं कृत्स्नां पूरय़िष्यति ते पतिः ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
यशसोऽर्थाय़ चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यशस्विनं वेदविदं विपश्चितं; वहुश्रुतं व्राह्मणमेव वासय़ ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
यशस्विनस्तीक्ष्णविषान्महारथा; नधिक्षिपन्मूढ न लज्जसे कथम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
यशस्विनी मन्युमती कुले जाता विभावरी ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
यशस्विनीनां मातॄणां शृणु नामानि भारत |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
यशस्विभिर्नागरथाश्वय़ोधिभिः; पदातिभिश्चाभिमुखैर्हतैः परैः |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वितः ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
यशस्वी रूपसम्पन्नो वह्वन्ने जाय़ते कुले ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
यशो दमो वुद्धिमती स्थितिश्च; शुभाशुभं मुनय़श्चैव सप्त ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
यशो दश दिशः पुण्यं गमय़ित्वा व्यवस्थितौ ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
यशो धर्मं च कीर्तिं च पालय़न्स्वर्गमाप्स्यसि |
९ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
यशो महदवाप्य त्वं प्रविशेदं पुरं पुनः ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
यशो रक्षस्व विदुर सम्प्रणीतं; मा व्यापृतः परकार्येषु भूस्त्वम् ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२७
व्राह्मण उवाच
यशो वर्चो भगश्चैव विजय़ः सिद्धितेजसी |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
यशोघ्नं प्रत्यमित्राणां यदूनां नन्दिवर्धनम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
यशोधर्मार्थभागी च भवति प्रेत्य मानवः ||
८६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
यशोमानौ वर्धय़न्यादवानां; पुराभिनच्छिशुपालं समीके |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यशोऽस्य पातितं देवि शरीरं त्ववशेषितम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
यश्च कश्चिद्द्विजातीनां शूद्रः शुश्रूषुराव्रजेत् |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यश्च कश्चिन्नरः किञ्चिदप्रिय़ं चाम्विकासुते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
यश्च कार्यार्थतत्त्वज्ञो जानमानो न भाषते |
४ क