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आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
यः सर्वां घातय़ामास पृथिवीं पुरुषाधमः |
८१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
यः सर्वान्पृथिवीपालान्समवेतान्महामृधे |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
यः सर्वेषां भवति ह्यर्चनीय़; उत्सेचने स्तम्भ इवाभिजातः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
यः सहस्रं समागच्छेद्यथा वाणो गुणच्युतः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
यः सहस्रं सहस्राणां पक्षान्सन्तत्य सम्पतेत् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
यः सहस्रं सहस्राणां भोजय़ेदनृचां नरः |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यः सहस्रं सहस्राणां राज्ञामय़ुत याजिनाम् |
९४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यः सहस्रं सहस्राणां श्वेतानश्वानवासृजत् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यः सहस्रसवे सत्रे जज्ञे विश्वसृजामृषिः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
यः सहाय़ान्परित्यज्य स्वस्तिमानाव्रजेद्गृहान् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
यः सहेत गदावेगं मम क्रुद्धस्य संय़ुगे ||
८४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
यः सहेत पुमाँल्लोके मदन्यो यदुपुङ्गव ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
यः सहेत रणे भीष्मं शरार्चिःपावकोपमम् ||
७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
यः साक्षाद्देवदेवेशं शितिकण्ठमुमापतिम् |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
यः साङ्ख्यमात्मनो वेद यस्य चात्मा वशे सदा ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
यः साधनार्थं काष्ठानि व्राह्मणेभ्यः प्रय़च्छति |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
यः साधोर्भूमिमादत्ते न भूमिं विन्दते तु सः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यः सुपर्णो यजुर्नाम छन्दोगात्रस्त्रिवृच्छिराः |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
यः सुवर्चा इति ख्यातः सोमपुत्रः प्रतापवान् |
८६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
यः सूतपुत्रः प्रहसन्दुरात्मा; पुराव्रवीन्निर्जितां सौवलेन |
४६ क
सभा पर्व
अध्याय ५७
विदुर उवाच
यः सौहृदे पुरुषं स्थापय़ित्वा; पश्चादेनं दूषय़ते स वालः ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
यः स्तेनैः सह सम्वन्धान्मुच्यते शपथैरपि |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
यः स्थितः पुरुषो धर्मे धात्रा सृष्टे यथार्थवत् |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
यः स्पर्धते रणे नित्यं जामदग्न्यं महावलम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
यः स्पर्धामनय़च्छक्रं देवराजं शतक्रतुम् |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
यः स्म रूपाणि कुरुते शतशोऽथ सहस्रशः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
युधिष्ठिर उवाच
यः स्यादुभय़भाग्धर्मस्तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
यः स्यादेकाय़ने लीनस्तूष्णीं किञ्चिदचिन्तय़न् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
यः स्याद्दान्तः सोमप आर्यशीलः; सानुक्रोशः सर्वसहो निराशीः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
यः स्याद्धारणसंय़ुक्तः स धर्म इति निश्चय़ः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
यकृत्कृष्णाय़सं तस्य त्रिभिरेव वभुः प्रजाः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
यक्षं समभिवाद्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत्स्थावरजङ्गमम् ||
१२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४५
भीष्म उवाच
यक्षगन्धर्वसिद्धानां मध्ये भ्राजन्तमिन्द्रवत् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षगन्धर्वय़ोषाभिरदृश्याभिर्निरीक्षितः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
युधिष्ठिर उवाच
यक्षरक्षःपिशाचानां मर्त्यानां च विशेषतः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
यक्षरक्षःपिशाचाश्च श्वापदानि च सङ्घशः |
४२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
यक्षरक्षःसमाकीर्णे रथाश्वद्विपदारुणे |
११४ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षराक्षसगन्धर्वाः पाण्डवस्य समीपतः ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय १५९
गन्धर्व उवाच
यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगमानवाः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
यक्षराक्षसगन्धर्वाः सिद्धाश्चान्ये दिवौकसः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १७२
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्रिणः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
यक्षराक्षसनागाश्च पिशाचा मनुजास्तथा ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यक्षराक्षसनागैश्चापीप्सितं यस्य यस्य यत् ||
१२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
यक्षराक्षसभर्ता च भगवान्नरवाहनः |
१२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
यक्षराक्षससङ्घैश्च विद्याधरगणैस्तथा ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५३
वासुदेव उवाच
यक्षराक्षसय़ोनीश्च यथावद्विचराम्यहम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
यक्षरूपं च तद्दीप्तं शिखण्डी प्रत्यपद्यत ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २९७
वैशम्पाय़न उवाच
यक्षस्य व्रुवतो राजन्नुपक्रम्य तदा स्थितः ||
१९ ख