शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
कपिल उवाच
यद्यत्र किञ्चित्प्रत्यक्षमहिंसाय़ाः परं मतम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
यद्यत्र न रुचिः काचिदेहि गच्छाव मातले |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
यद्यत्र वृद्धेषु कृतः प्रवेशो; युक्तं मम द्वारपाल प्रवेष्टुम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यथा यादृशं चैव युद्धं वृत्तं च साम्प्रतम् |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
२५९
व्रह्मो उवाच
यद्यदग्नौ हुतं सर्वं शिरस्ते महदीप्सय़ा |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
यद्यदङ्गं हि सोऽपश्यत्तस्या विप्रर्षभस्तदा |
७२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
यद्यदर्हेत्स वार्ष्णेय़स्तत्तद्देय़मसंशय़म् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६३
सञ्जय़ उवाच
यद्यदस्त्रं स पार्थाय़ प्रय़ुङ्क्ते विजिगीषय़ा |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यद्यदस्मद्धितं कृष्ण तत्तद्वाच्यः सुय़ोधनः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
यद्यदागमसंय़ुक्तं न कृत्स्नमुपशाम्यति |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
यद्यदाचरते राजा तत्प्रजानां हि रोचते ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
यद्यदाचरते शास्त्रमथ सर्वप्रवृत्तिषु |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
यद्यदात्मन इच्छेत तत्परस्यापि चिन्तय़ेत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
यद्यदालम्वसे काम तत्तदेवानुरुध्यसे ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
यद्यदास्यमनुज्ञां वै पूर्वमेव गृहान्प्रति |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यदिच्छति यावच्च यदन्यदपि काङ्क्षितम् ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३८
व्रह्मो उवाच
यद्यदिच्छन्ति तत्सर्वं भजन्ते विभजन्ति च ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
यद्यदिच्छन्ति तन्मार्गमभिगच्छन्ति मानवाः |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यदिच्छसि चेदस्त्रं मत्तस्तत्तद्ददानि ते ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
व्यास उवाच
यद्यदिच्छसि मैत्रेय़ यावद्यावद्यथा तथा |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यदिच्छसि यावच्च गृह्यतां मद्गृहादिति ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यदिच्छेदय़ं शौरिस्तत्तत्कुर्यादय़त्नतः ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यद्यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दय़ितं गृहे |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
यद्यदिष्टमसन्तोषाद्दुरात्मा पापमाचरन् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
२५९
व्रह्मो उवाच
यद्यदिष्टमृते त्वेकममरत्वं तथास्तु तत् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
यद्यदेवङ्गतेनाद्य शक्यं कर्तुं मय़ा तव |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यदेय़ं पुरा दत्तं राज्यं परवतो मम |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यद्यद्धर्मेण संय़ुक्तमुपपद्येद्धितं वचः |
९३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
यद्यद्धि किञ्चित्सन्धाय़ पुरुषस्तप्यते तपः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
यद्यद्धि व्याक्षिपद्युद्धे पाण्डवोऽस्त्रं जिघांसय़ा |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
यद्यद्ध्ययं कामय़ते स धर्मो; न यो धर्मो निय़मस्तस्य मूलम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
यद्यद्य चिरकारी त्वं ततोऽसि चिरकारिकः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
यद्यद्य चिरकारी स्यात्स मां त्राय़ेत पातकात् ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा |
४१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यद्व्रूते च किञ्चित्स धृतराष्ट्रो नराधिपः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
यद्यद्व्रूय़ादल्पमतिस्तत्तदस्य सहेत्सदा |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यद्व्रूय़ान्महातेजास्तत्तद्देय़ममत्सरात् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
यद्यद्व्रूय़ान्मुनिस्तत्तत्सर्वं देय़मशङ्कितैः ||
३८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
यद्यनेन हता वाल्ये शकुनिश्चित्रमत्र किम् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
८८
वसुमना उवाच
यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्म; न्क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
प्रतर्दन उवाच
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता; स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
अष्टक उवाच
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता; स्तानाक्रम क्षिप्रममित्रसाह ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
अष्टक उवाच
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः; क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
८७
प्रतर्दन उवाच
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः; क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
शिविरु उवाच
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः; क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यन्मुञ्चति गात्राणां स शन्तनुसुतस्तदा |
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
यद्यन्यथा प्रवर्तेथाः शपेय़ं त्वामहं रुषा ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
यद्यन्यवशगेनेदं कृतं ते पन्नगाशुभम् |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१४
धृतराष्ट्र उवाच
यद्यन्येन मदीय़ेन तदनुज्ञातुमर्हथ ||
१४ ख