chevron_left  यदमूर्त्यसृजद्व्यक्तंarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २९१
वसिष्ठ उवाच
यदमूर्त्यसृजद्व्यक्तं तत्तन्मूर्त्यधितिष्ठति |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्जुन उवाच त्वां परं कौतूहलं हि मे ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
यदर्जुनहृषीकेशौ प्रत्युद्यातोऽविचारय़न् ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्जुनो धनुःश्रेष्ठं वाहुभ्यामाक्षिपद्रथे ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
यदर्जुनो रणे क्रुद्धः संय़ातस्तावकान्प्रति ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८५
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्जुनो वै पृथुदीर्घवाहु; र्धर्मेण विन्देत सुतां ममेति ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
यदर्थं कर्मसंसर्गः कर्मणां च फलोदय़ः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
यदर्थं क्षत्रिय़ा सूते गर्भं तदिदमागतम् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
भीम उवाच
यदर्थं क्षत्रिय़ा सूते तस्य कालोऽय़मागतः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थं क्षत्रिय़ा सूते तस्य कालोऽय़मागतः ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
यदर्थं क्षत्रिय़ा सूते तस्य कालोऽय़मागतः |
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
यदर्थं गा गताश्चैव सौरभ्यः सुरसत्तम |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
यदर्थं च महादेवः प्रय़तेन मय़ा पुरा |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
यदर्थं चाप्यपहृतं येन यच्चैव मन्त्रितम् |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
यदर्थं तच्च ते तात प्रवक्ष्ये वसुधाधिप ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५६
च्यवन उवाच
यदर्थं त्वाहमुच्छेत्तुं सम्प्राप्तो मनुजाधिप ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
यदर्थं निहतो वाली मय़ा रघुकुलोद्वह |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
यदर्थं नृषु सम्भूतौ नरनाराय़णावुभौ ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ८५
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थं पुरुषव्याघ्र कीर्तय़न्ति पुरातनाः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
यदर्थं पुरुषव्याघ्र पुत्रमिच्छन्ति मानवाः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
यदर्थं पृथगध्यास्ते मनस्तत्परिषीदति ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
अग्निरु उवाच
यदर्थं मां प्राहिणोत्त्वत्सकाशं; वृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थं मां सुरश्रेष्ठ इदं वचनमव्रवीत् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
यदर्थं युधि सम्प्रेक्ष्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
दुर्योधन उवाच
यदर्थं राज्यमिच्छामि कुरूणां कुरुनन्दन |
४१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थं वनवासश्च प्राप्तं दुःखं च यन्मय़ा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
यदर्थं वुद्धिरध्यास्ते न सोऽर्थः परिषीदति |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
यदर्थं वेदशव्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थं शार्ङ्गकानग्निर्न ददाह तथागते |
४ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
यदर्थमभ्युद्यतमुत्तमं त; त्करोति कर्माग्र्यमपारणीय़म् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थमसि सम्प्राप्तस्तदाचक्ष्व महाद्युते ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थमसि सम्प्राप्ता मत्सकाशं वसुन्धरे |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १६४
इन्द्र उवाच
यदर्थमस्त्राणीप्सुस्त्वं तं कामं पाण्डवाप्नुहि ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
हनूमानु उवाच
यदर्थमागतश्चासि तत्सरोऽभ्यर्ण एव हि ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
यदर्थमात्मप्रभवेह जन्म; तवोत्तमं धर्मगृहे चतुर्धा |
२ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
यदर्थमिष्यते भार्या प्राप्तः सोऽर्थस्त्वय़ा मय़ि |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
जनमेजय़ उवाच
यदर्थमिह सम्भूता देवकल्पा महारथाः |
२ क
वन पर्व
अध्याय २०५
मार्कण्डेय़ उवाच
यदर्थमुक्तोऽसि तय़ा गच्छस्व मिथिलामिति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
यदर्थमुपजीवन्ति पौराः सहपुरेश्वराः |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थमय़मारम्भस्तव कल्याणि हृद्गतः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
यदर्थशास्त्रागममन्त्रविद्भि; र्यज्ञैरनेकैर्वरगोप्रदानैः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ८८
यय़ातिरु उवाच
यदर्हाय़ ददध्वं तत्सन्तः सत्यानृशंस्यतः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
यदवप्लुत्य जग्राह घोरां शङ्करनिर्मिताम् ||
१०६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
यदवप्लुत्य जग्राह देवसृष्टां महाशनिम् ||
९३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
यदवाप्तं च मे पूर्वं देवदेवान्महेश्वरात् |
७४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
यदवाप्तं च मे पूर्वं साम्वहेतोः सुदुष्करम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यदवाप्तं च मे सर्वं प्रसादात्तस्य धीमतः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
यदवाप्तं महाराज श्रेय़ो यच्चार्जितं यशः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
यदव्रवीत्सुतस्तेऽसौ तन्मे शृणु जनेश्वर ||
२५ ग
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
यदव्रवीन्मे धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान् |
५७ क