वन पर्व
अध्याय
६८
वृहदश्व उवाच
यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् |
१५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा न युध्यमानस्त्वं सम्प्रमुह्यसि पुत्रक |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
यथा न वध्येत रणेऽर्जुनेन; जय़द्रथः कर्ण तथा कुरुष्व ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
यथा न वाणा नास्त्राणि विषहिष्यन्ति ते रणे ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
धृतराष्ट्र उवाच
यथा न वाय़ुर्नादित्यः पश्येतां तां सुसंवृताम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
यथा न विद्युरन्योन्यं प्रणिधेय़ास्तथा हि ते ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा न विभ्रमेत्सेना तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
यथा न सदृशी जातु व्राह्मण्याः क्षत्रिय़ा भवेत् |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय
२१
द्रौपद्यु उवाच
यथा न सन्त्यजेथास्त्वं सत्यं वै मत्कृते विभो |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
यथा न हन्याद्गाङ्गेय़ं दुःशासन तथा कुरु ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
यथा न हन्युर्नः सेनां तथा माधव चोदय़ ||
४३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यथा न होमः क्रिय़ते महामृधे; तथा समेत्य प्रय़तध्वमादृताः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३५
वैशम्पाय़न उवाच
यथा नः स तथा नस्त्वं निर्विशेषा वय़ं त्वय़ि |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
९१
वसव ऊचुः
यथा नचिरकालं नो निष्कृतिः स्यात्त्रिलोकगे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यथा नडवनं क्रुद्धः प्रभिन्नः षष्टिहाय़नः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा नदति सुग्रीवो वलवानेष वानरः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
यथा नदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
यथा नदीनां वहवोऽम्वुवेगाः; समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
यथा नरं निहत्याशु भुजगः कालचोदितः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
युधिष्ठिर उवाच
यथा नरेण कर्तव्यं यश्च धर्मः सनातनः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
यथा नवोद्वाहकृतं स्नानमाल्यविभूषितम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
वासुकिरु उवाच
यथा नष्टं पुरा देवा गूढमग्निं गुहागतम् ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
यथा नागो वने नागं मत्तो मत्तमुपाद्रवत् ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यथा नातीतमर्थं वै पश्चात्तापेन युज्यते ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
युधिष्ठिर उवाच
यथा नान्यस्य लोकेऽस्मिन्द्वितीय़स्येह कस्यचित् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
यथा नाभिभवत्यस्मांस्तथा नीतिर्विधीय़ताम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
यथा नाराय़णे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११५
नारद उवाच
यथा नाराय़णो लक्ष्म्यां जाह्नव्यां च यथोदधिः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
अप्सरस ऊचुः
यथा नावाप्स्यसि भय़ं तस्माद्वलनिषूदन ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
यथा नासत्कृतं किञ्चिन्मनसापि चराम्यहम् ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय
४६
द्रोण उवाच
यथा नाय़ं समाय़ुज्याद्धार्तराष्ट्रान्कथञ्चन |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा निकृतिमास्थाय़ भ्रंशिताः पाण्डवाः सुखात् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
यथा निदाघे ज्वलनः समिद्धो; दहेत्कक्षं वाय़ुना चोद्यमानः |
६१ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
यथा निरहरद्वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०४
नारद उवाच
यथा निर्वन्धतः प्राप्तो गालवेन पराजय़ः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
यथा निवर्तते कर्म जपतो व्रह्मचारिणः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
द्रौपद्यु उवाच
यथा निश्चेतनो वालः कूलस्थः कूलमुत्तरम् |
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
यथा निष्ठाकरं शुल्कं न जात्वासीत्तथा शृणु ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
यथा निहत्यारिगणाञ्शतक्रतु; र्दिवं तथानर्तपुरीं प्रतापवान् ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
इन्द्र उवाच
यथा नीतिं गमय़त्यर्थलोभा; च्छ्रेय़ांस्तस्मादाश्रमः क्षत्रधर्मः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
यथा नूनं देवराजस्य देवाः; शुश्रूषन्ते वज्रहस्तस्य सर्वे |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
यथा नृपतिसिंहानां मध्ये त्वां वरय़त्ययम् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा नो न ग्रसेय़ुस्ते सपुत्रवलवान्धवान् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९८
मनुरु उवाच
यथा पञ्च विमुक्तानि इन्द्रिय़ाणि स्वकर्मभिः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
यथा पञ्चसु भूतेषु संश्रितत्वं निगच्छति |
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
यथा पतिस्तस्य हि सर्वकामा; लभ्याः प्रसादे कुपितश्च हन्यात् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
यथा पत्याश्रय़ो धर्मः स्त्रीणां लोके युधिष्ठिर |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
यथा पत्याश्रय़ो धर्मः स्त्रीणां लोके सनातनः |
२९ क