शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
यास्माकं विहिता वृत्तिः कापोती जातिधर्मतः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
यातुधान्यु उवाच
यास्मि सास्म्यनुय़ोगो मे न कर्तव्यः कथञ्चन |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
यास्य घोरतमा मूर्तिर्जगत्संहरते तय़ा |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
यास्य घोरतरा मूर्तिः सर्वानत्ति तय़ेश्वरः ||
९७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
यास्यसि व्रह्मणः स्थानमनिमित्तमनिन्दितम् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
याहं गाण्डीवधन्वानं सर्वशस्त्रभृतां वरम् |
६९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
याहं त्वय़ा विहीनाद्य पत्या पुत्रेण चैव ह |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
याहं प्रमाथादिह सम्प्रतीता; सौवीरराजं कृपणं वदेय़म् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
याहि देव यतो दैत्याश्चोदय़ाश्वानतन्द्रितः |
११३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
याहि पाञ्चालदाय़ादमहं यास्ये युधिष्ठिरम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
याहि मद्रेश चाप्येनं कर्णः प्राह युय़ुत्सय़ा ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
याहि संशप्तकान्कृष्ण कार्यमेतत्परं मम ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
याहि सूत यतो रामः सज्जोऽहं गतवेदनः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
याहि स्वर्गं पुरस्कृत्य यशसे विजय़ाय़ च ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
याहीत्येवाव्रवीदेनं द्रोणानीकाय़ माचिरम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
याह्यविघ्नेन वै वीर द्रक्ष्यामस्त्वां सभागतम् ||
७२ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
याय़ातेनापि वय़सा राज्यं पूरुरकारय़त् ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
याय़ादश्वप्रय़ुक्तेन तथा वुद्धिमतां गतिः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३४
व्रह्मो उवाच
याय़ावरकुले धीमान्भविष्यति महानृषिः |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
याय़ावरकुलोत्पन्नं जरत्कारुसुतं तदा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१३
पितर ऊचुः
याय़ावरा नाम वय़मृषय़ः संशितव्रताः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
४१
पितर ऊचुः
याय़ावरा नाम वय़मृषय़ः संशितव्रताः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
याय़ावराणां धर्मज्ञः प्रवरः संशितव्रतः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
यिधिष्ठिरोऽपि कौरव्यो यमाभ्यां सहितः प्रभुः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
यिय़ासतस्ततः कृष्णः पार्थस्याश्वान्मनोजवान् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
यिय़ासुर्यमलोकाय़ मम वीर्यं प्रतीक्षते ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
यिय़ासुर्व्रह्मलोकाय़ प्राणान्प्राणेष्वथाजुहोत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
युक्त एव हि भाग्येन ध्रुवमुत्पद्यते नरः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
युक्तं गजनिभैर्वाहैः पिशाचवदनैः खरैः |
८८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
युक्तं गजनिभैर्वाहैर्न हय़ैर्नापि वा गजैः ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
युक्तं तस्य परित्राणं कर्तुमस्माभिरच्युताः ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
युक्तं तस्याप्रमेय़स्य वीर्यसत्त्ववतो मय़ा |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
युक्तं तु रथमास्थाय़ दारुकेण महात्मना |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं दुर्योधनानर्थे सृष्टं द्रोणवधाय़ च ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं धनञ्जय़प्रेष्ये शूरमाचार्यकर्मणि |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं धनञ्जय़हिते ममानर्थाय़ चोत्तमम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
युक्तं न्याय़्यं च कुर्युस्ते न च तद्वर्तते तथा ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
युक्तं पक्षैः प्रपक्षैश्च सेनानीकं प्रकाशते ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
युक्तं परमकाम्वोजैर्यो मे व्रूय़ाद्धनञ्जय़म् ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं परमकाम्वोजैस्तुरगैर्हेममालिभिः ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं परमय़ा लक्ष्म्या पश्येतां जीवितं भवेत् ||
११ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं पापकृतां गन्धैर्मांसशोणितकर्दमम् ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
युक्तं प्रगृह्य भगवान्व्यवसाय़ो जगाम तम् ||
८८ ख
विराट पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं प्राप्तं च वृद्धेन पाण्डवान्प्रति भाषितम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
युक्तं योगेन योगज्ञास्तावकाः समपूजय़न् ||
४३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं रथं दिव्यमादित्यवर्णं; हय़ाहरन्पश्यतो दारुकस्य |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं रथवरं तस्मा आचचक्षे नरर्षभ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
युक्तं षोडशभिर्गोभिः पाण्डुरैः शुभलक्षणैः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
युक्तं समारुह्य च तं विमानप्रतिमं रथम् |
४६ क