chevron_left  यद्येवोर्ध्वंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय १२३
भीष्म उवाच
यद्येवोर्ध्वं यद्यवाक्च त्वं लोकमभिय़ास्यसि ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ९५
अगस्त्य उवाच
यद्येष कामः सुभगे तव वुद्ध्या विनिश्चितः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येष दर्पाद्धर्षाद्वा यदि वा व्रह्मचापलात् |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ३७
दुर्योधन उवाच
यद्येष पार्थो राधेय़ कृतं कार्यं भवेन्मम |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ६६
विराट उवाच
यद्येष राजा कौरव्यः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१ क
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्येष राजा मत्स्यानां यदि वीभत्सुरागतः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
यद्येष राजा मत्स्यानां यदि वीभत्सुरागतः |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५७
वासुदेव उवाच
यद्येष वलमास्थाय़ न्याय़ेन प्रहरिष्यति |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १९
वदान्य उवाच
यद्येष समय़ः सत्यः साध्यतां तत्र गम्यताम् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
श्वपच उवाच
यद्येष हेतुस्तव खादनस्य; न ते वेदः कारणं नान्यधर्मः |
८५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
स्यूमरश्मिरु उवाच
यद्येषा परमा निष्ठा यद्येषा परमा गतिः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
यद्येषां न भवेद्गोप्ता विष्वक्सेनो महावलः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
यद्राजा रक्षणे युक्तो भूतेषु कुरुते दय़ाम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्राज्यं महदुत्सृज्य स्वल्पे तुष्यसि पार्थिव ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
यद्रामस्त्वय़ि पार्श्वस्थे स्वय़ं रावणमभ्यगात् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
यद्राष्ट्रेऽकुशलं किञ्चिद्राज्ञोऽरक्षय़तः प्रजाः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
यद्वः कार्यं तत्कुरुध्वं यथास्व; मिष्टान्दारानात्मजांश्चोपभुङ्क्त ||
९१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वः स भैरवं कुर्वन्नर्जुनो भृशमभ्यगात् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वः सङ्कल्पितं रूपं मनसा यस्य यादृशम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
यद्वक्ष्यसि कुरुश्रेष्ठ तस्य दातास्मि तेऽनघ ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वक्ष्यसि महावाहो तत्करिष्यामि पुत्रक ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
यद्वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञ वाक्यं कुरुकुलाधम ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वचः फल्गुनेनोक्तं न ज्याय़ोऽस्ति धनादिति |
२ क
वन पर्व
अध्याय २१६
मार्कण्डेय़ उवाच
यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् ||
१३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
यद्वत्कान्तारमातिष्ठन्नौत्सुक्यं समनुव्रजेत् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
यद्वन्मनोरथैश्वर्यं स्वप्ने तद्वन्मनोगतम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१४
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
युधिष्ठिर उवाच
यद्वरं सर्वतीर्थानां तद्व्रवीहि पितामह |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४३
भीष्म उवाच
यद्वर्तते यच्च भविष्यतीह; सर्वमेतत्केशवं त्वं प्रतीहि ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९४
सञ्जय़ उवाच
यद्वर्तमानानिषुगोचरेऽरी; न्ददाह वाणैर्हुतभुग्यथैव ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
यद्वलं तव वीर्यं च केशवस्य तथैव च |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
यद्वलं धार्तराष्ट्राणां पाण्डवानां यतो भय़म् |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
यद्वलं यच्च ते वीर्यं प्रद्वेषो यश्च पाण्डुषु |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
यद्वलानां वलं श्रेष्ठं तत्प्रज्ञावलमुच्यते ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
यद्वस्तत्सर्वराजानस्तेजस्तिग्ममुपासते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १३१
राजो उवाच
यद्वा कामय़से किञ्चिच्छ्येन सर्वं ददानि ते |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
यद्वा तेऽन्यद्द्विजश्रेष्ठ मनसः सुप्रिय़ं भवेत् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वा परमकं तेजो येन युक्ता दिवौकसः |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वाक्यमर्जुनेनोक्तं सञ्जय़ेन निवेदितम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वाच्यं हितकामेन सुहृदा भूतिमिच्छता |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
यद्वाप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कथञ्चन ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
यद्विद्यते विदितं स्थानमस्ति; तद्व्रूहि त्वं त्वरितो ह्येष यामि ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १६
व्राह्मण उवाच
यद्विनष्टाः कुरुश्रेष्ठा राजानश्च सहस्रशः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्विन्देथाः सुखं राजंस्तद्व्रूहि भरतर्षभ ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्विवेश महावाहुं तत्तेजः पुरुषोत्तमम् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
यद्विशिष्टं महावाहो सर्वशस्त्रविघातनम् ||
१२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
जनमेजय़ उवाच
यद्वीर्या यादृशाश्चैव यावन्तो यत्पराक्रमाः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
यद्वृत्तं तात सङ्ग्रामे मन्दस्यापनय़ैर्भृशम् |
५० क