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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
यद्धि किञ्चित्कृतं लोके कर्तव्यं क्रिय़ते च यत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
नारद उवाच
यद्धि किञ्चिदिह प्राणि शल्मले चेष्टते भुवि |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
यद्धि गुप्तावशिष्टं स्यात्तद्धितं धर्मकामय़ोः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
यद्धि भूतं भविष्यच्च ध्रुवं तन्न भविष्यति |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
यद्धि भूतं भविष्यच्च भवच्च पुरुषर्षभ |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११६
युधिष्ठिर उवाच
यद्धितं राज्यतन्त्रस्य कुलस्य च सुखोदय़म् |
३ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
यद्ध्ययं पुरुषः किञ्चित्कुरुते वै शुभाशुभम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
यद्भक्षः स्यात्ततो दद्याद्भिक्षां नित्यमतन्द्रितः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
यद्भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ||
१८ ग
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
यद्भवत्यवरे स्थाने स्थितानां तच्च दुष्करम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
यद्भवानाह तत्सर्वं मय़ा ते लोमश श्रुतम् |
१२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
यद्भवानाह भीष्मस्य प्रभावं प्रति माधव |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
यद्भवान्मन्यते चापि शुभं वा यदि वाशुभम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
यद्भविष्यति वृत्तं वा वर्तते वा शुभाशुभम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
यद्भवेत्प्रतिपत्तव्यं तद्भवान्प्रव्रवीतु मे ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
यद्भार्यां परिरक्षन्ति भर्तारोऽल्पवला अपि ||
६० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
वासुदेव उवाच
यद्भिन्नं यच्च वै दग्धं तेन विप्रेण पुत्रक ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
धृतराष्ट्र उवाच
यद्भीमसेनः समरे पुत्रान्मम विचेतसः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
यद्भीमसेनः सहते सिंहनादममर्षणः ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय २५
सूत उवाच
यद्भुक्त्वामृतमाहर्तुं समर्थः स्यामहं प्रभो ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
यद्भुङ्क्षे पृथिवीं सर्वां शूरैर्निहतकण्टकाम् ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
यद्भूतहितमत्यन्तं तत्सत्यमिति धारणा |
४ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
यद्भूतहितमत्यन्तं तद्वै सत्यं परं मतम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं मतं मम ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
यद्भूतहितमत्यन्तमेतत्सत्यं व्रवीम्यहम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
यद्भूलोके सुदुर्ज्ञातं तत्ते वक्ष्यामि भारत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
यद्भैक्षमाचरिष्याम वृष्ण्यन्धकपुरे वय़म् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
यद्भय़ं नोऽसुरात्तस्मान्नाशय़ेद्धव्यवाहन ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम् |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
यद्यगां परवीरघ्न न हि जीवेत्सुय़ोधनः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु |
११ क
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
यद्यग्नय़ो हि स्पृश्येय़ुर्निवेशस्था दवाग्निना |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
यद्यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् |
११ क
आदि पर्व
अध्याय ५६
जनमेजय़ उवाच
यद्यच्च कृतवन्तस्ते तत्र तत्र महारथाः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
यद्यच्च कृतवानन्यत्पार्थस्तदखिलं वद |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
यद्यच्च गावो मनसा तस्मिन्वाञ्छन्ति वासव |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वासुदेव उवाच
यद्यच्च धर्मसंय़ुक्तमर्थय़ुक्तमथापि वा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
भीष्म उवाच
यद्यच्च नाभिजानाति यद्भोज्यं नाभिनन्दति |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
यद्यच्चकार द्रोणस्तु कुन्तीपुत्रजिगीषय़ा |
२६ क
वन पर्व
अध्याय १५७
जनमेजय़ उवाच
यद्यच्चक्रे महावाहुस्तस्मिन्हैमवते गिरौ |
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
यद्यच्चापि हतं तत्र तत्तथैव प्रदीय़ते ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
यद्यच्छरीरेण करोति कर्म; शरीरय़ुक्तः समुपाश्नुते तत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भरद्वाज उवाच
यद्यजीवं शरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
यद्यत्तत्र प्राप्तकालं परेभ्य; स्त्वं मन्येथा भारतानां हितं च |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
यद्यत्तेषां महावाहो पथ्यं स्यान्मधुसूदन |
१०० क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
यद्यत्त्यजति कामानां तत्सुखस्याभिपूर्यते |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
यद्यत्त्यजति कामानां तत्सुखस्याभिपूर्यते |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
यद्यत्प्रदीय़ते दानमुत्तराविषय़े नरैः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
यद्यत्प्रिय़ं यस्य सुखं तदाहु; स्तदेव दुःखं प्रवदन्त्यनिष्टम् |
१० क