विराट पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वलाहके विद्युत्पावको वा शिलोच्चय़े |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
यथा वलीय़सः सन्तस्तत्सर्वं कुरवो विदुः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वसिष्ठ उवाच
यथा वहु प्रतीच्छन्हि पापिष्ठां लभते गतिम् ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वह्नेर्यथार्कस्य सोमस्य च यथैव सा |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
यथा वा पशुमध्यस्थो द्रावय़ेत पशून्वृकः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वा मन्यते राजा द्रुपदः सर्वधर्मवित् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
यथा वा मन्यसे राजंस्तत्क्षिप्रं संविधीय़ताम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२१
लोमश उवाच
यथा वा वर्षतो धारा असङ्ख्येय़ाश्च केनचित् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
यथा वा वाससी शुक्ले महारजनरञ्जिते |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९१
भगवानु उवाच
यथा वाच्यस्त्वद्विधेन सुहृदा मद्विधः सुहृत् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
यथा वारिचरः पक्षी न लिप्यति जले चरन् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
यथा वारिचरः पक्षी लिप्यमानो न लिप्यते |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
यथा वार्धुषिको वृद्धिं देहभेदे प्रतीक्षते |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
यथा वारय़ते वेला क्षुभितं वै महार्णवम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२०
नारद उवाच
यथा वालेषु नारीषु वैहार्येषु तथैव च ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
यथा वाय़ुः समासाद्य तूलराशिं समन्ततः ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
यथा वाय़ुर्जलधरान्विकर्षति ततस्ततः |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
यथा वाय़ुर्नरव्याघ्र तथा कृष्णो न संशय़ः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
३१
द्रौपद्यु उवाच
यथा वाय़ोस्तृणाग्राणि वशं यान्ति वलीय़सः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यथा विभेद समय़ं नमुचेर्वासवः पुरा ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
यथा विवान्नित्यगतिर्जलदाञ्शतशोऽम्वरे ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
यथा विविधवृत्तानामैश्वर्यममराधिप ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
यथा विशोका गच्छेय़मशोकनग तत्कुरु |
१०२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
यथा विश्वानि भूतानि वृष्ट्या भूय़ांसि प्रावृषि |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
यथा विष्णुः पुरा राजन्हिरण्याक्षेण संय़ुगे ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
नारद उवाच
यथा विष्णुकुले लक्ष्मीर्यथा स्वाहा विभावसोः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा विष्णुमय़ं सत्यं यथा विष्णुमय़ं हविः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा विष्णुमय़ं सर्वं पाप्मा मे नश्यतां तथा ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
यथा विसृजतश्चास्य सन्दधानस्य चाशुगान् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
यथा वीजं विना क्षेत्रमुप्तं भवति निष्फलम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
यथा वीजानि रोहन्ति प्रकीर्णानि महीतले |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
यथा वुधश्च शुक्रश्च महाराज नभस्तले ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वृक्षान्महाकाय़ः प्रत्यगृह्णादथो शिलाः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
यथा वृत्तं श्रुतं चैव मय़ापि वसुधाधिप ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
सावित्र्यु उवाच
यथा वृत्तं सुखोदर्कमिदं दुःखं महन्मम ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वृत्तं हि कल्पादौ दृष्टं मे ज्ञानचक्षुषा ||
२३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
यथा वृत्रवधे देवा मुदा शक्रं महर्षिभिः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
यथा वृद्धं वाय़ुवशेन शोचे; त्क्षेमं मुमुक्षुः शिशिरव्यपाय़े ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यथा वृद्धातुरकृशा निःस्पृहा विषय़ान्प्रति |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२१
व्यास उवाच
यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रिय़संय़मः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१५
भीष्म उवाच
यथा वेदय़ते कश्चिदोदनं वाय़सो वदन् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
यथा वेलां समासाद्य सागरो मकरालय़ः ||
५९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण्यु उवाच
यथा वै पञ्च होतारः परो भावस्तथोच्यताम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
यथा वै व्राह्मणः सीदन्नय़ाज्यमपि याजय़ेत् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
यथा वैतंसिको युक्तो द्विजानां सदृशस्वनः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
यथा वैतरणी प्रेतान्प्रेतराजपुरं प्रति ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
यथा वैतरणी राजन्यमराष्ट्रपुरं प्रति ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
यथा वैतरणीमुग्रां दुस्तरामकृतात्मभिः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
यथा वैन्यो महातेजास्तथा त्वमपि विश्रुतः ||
११० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती |
६ क