स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
ये पुरा शेरते वीराः शय़नेषु यशस्विनः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
ये पूजय़िष्यन्ति नरा राजानश्च महं मम |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
ये पृथिव्यां समुद्भूता राजानो युद्धदुर्मदाः |
१०० क
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
ये पृष्ठतस्ते त्वरय़न्ति राज; न्ये त्वग्रतस्ते प्रतिषेधय़न्ति ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये प्रतिग्रहनिःस्नेहास्ते नराः स्वर्गगामिनः ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये प्रत्यवसिताश्चैव ते वै निरय़गामिनः ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
ये प्रपन्ना हृषीकेशं न ते मुह्यन्ति कर्हिचित् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
ये भक्ता वरदं देवं शिवं रुद्रमुमापतिम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ये भक्षय़न्ति मांसानि भूतानां जीवितैषिणाम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मय़ि ते तेषु चाप्यहम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
ये भरन्ति द्विजश्रेष्ठं नोपसर्पन्ति ते यमम् ||
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ये भवन्ति मनुष्याणां तान्मे निगदतः शृणु ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये भागा रक्षसां प्रोक्तास्त उक्ता भरतर्षभ |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
ये भीमसेनं ददृशुस्तदानीं; भय़ेन तेऽपि व्यथिता निपेतुः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
धृतराष्ट्र उवाच
ये भीमसेनं सङ्क्रुद्धमभ्यधावन्विमोहिताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
स्यूमरश्मिरु उवाच
ये भुञ्जते ये ददते यजन्तेऽधीय़ते च ये |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
ये भूतान्यनुगृह्णन्ति वर्धय़न्ति च ये प्रजाः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
ये भृत्यभरणे सक्ताः सततं चातिथिप्रिय़ाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
ये भृत्याः पार्थिवहितास्तेषां सान्त्वं प्रय़ोजय़ेत् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
ये मदर्थं परीप्सन्ति वसुधां वसुधाधिपाः |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
ये मदर्थे हताः शूरास्तेषां कृतमनुस्मरन् |
४२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
ये मन्दमनुय़ास्यध्वं यान्तं वैवस्वतक्षय़म् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
ये मन्यन्ते क्रय़ं शुल्कं न ते धर्मविदो जनाः ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४३
विपुल उवाच
ये मां जानन्ति तत्त्वेन तांश्च मे वक्तुमर्हसि ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
ये मां युद्धेऽभिय़ोत्स्यन्ति तान्हनिष्यामि भारत |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
ये मां विप्रकृतां क्षुद्रैरुपेक्षध्वं विशोकवत् |
११३ क
विराट पर्व
अध्याय
३
नकुल उवाच
ये मामामन्त्रय़िष्यन्ति विराटनगरे जनाः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
ये मार्गमनुरुन्धन्ति ते वै निरय़गामिनः ||
७५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
ये मुक्ता द्रोणभीष्माभ्यां कर्णाद्वैकर्तनात्कृपात् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३८
दुर्योधन उवाच
ये मे निराकृता नित्यं रिपुर्येषामहं सदा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
ये मेहन्ति च पन्थानं ते भवन्ति गताय़ुषः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
ये यजन्ति पितॄन्देवान्गुरूंश्चैवातिथींस्तथा |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
ये यवान्ना जनपदा गोधूमान्नास्तथैव च |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
भीमसेन उवाच
ये यस्या विचरन्तीह पुरुषा वशवर्तिनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
ये यान्ति यान्त्वेव शिनिप्रवीर; येऽपि स्थिताः सात्वत तेऽपि यान्तु |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
ये ये च भावा लोकेऽस्मिन्सर्वेष्वेतेषु ते त्रिषु |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
ये ये ददृशिरे तत्र यद्यद्रूपं यथा यथा |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
ये ये ददृशिरे तत्र विसञ्ज्ञाः प्राय़शोऽभवन् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
ये ये नो न प्रदास्यन्ति तांस्तान्सेनाभिय़ास्यति ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
ये ये प्रमुखतो राजन्न्यवर्तन्त महात्मनः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
८४
अष्टक उवाच
ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्र प्रधाना; स्त्वय़ा भुक्ता यं च कालं यथा च |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
मार्कण्डेय़ उवाच
ये योगय़ुक्तास्तपसि प्रसक्ताः; स्वाध्याय़शीला जरय़न्ति देहान् |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५६
धृतराष्ट्र उवाच
ये योत्स्यन्ते पाण्डवार्थे पुत्रस्य मम वाहिनीम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२२
मैत्रेय़ उवाच
ये योनिशुद्धाः सततं तपस्यभिरता भृशम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
ये रणाग्रे महीपालाः शूराः समितिशोभनाः |
८२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
ये रथाः पृथिवीपाल तथैवातिरथाश्च ये ||
१७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
ये राजकार्येषु पुरा व्यासक्ता नित्यशोऽभवन् |
२ क