विराट पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
यस्य सूर्यसमाः पञ्च सपत्नाः स्युः प्रहारिणः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य सेन्द्राः सवरुणा वृहस्पतिपुरोगमाः |
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९५
वामदेव उवाच
यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रिय़राजकः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
यस्य स्फीतो जनपदः सम्पन्नः प्रिय़राजकः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
यस्य स्म ददतो वित्तं न कदाचन हीय़ते |
४ क
वन पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य स्म धनुषो घोषः श्रूय़तेऽशनिनिस्वनः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय
१८
द्रौपद्यु उवाच
यस्य स्म रथघोषेण समकम्पत मेदिनी |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
यस्य स्म विषय़े राज्ञः स्तेनो भवति वै द्विजः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
भीष्म उवाच
यस्य स्म विषय़े राज्ञः स्तेनो भवति वै द्विजः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
यस्य स्म व्यसने राजन्ननुमोदन्ति शत्रवः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५९
गन्धर्व उवाच
यस्य स्याद्धर्मविद्वाग्मी पुरोधाः शीलवाञ्शुचिः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
यस्य स्याद्विजय़ः कृष्ण तस्याप्यपचय़ो ध्रुवम् ||
५४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
यस्य स्वल्पं प्रिय़ं लोके ध्रुवं तस्याल्पमप्रिय़म् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंय़तम् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
यस्य ह्यन्नमुपाश्नन्ति व्राह्मणानां शता दश |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
यस्य ह्यर्थाभिनिर्वृत्तौ भवन्त्याप्याय़िताः परे |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
कापव्य उवाच
यस्य ह्येते सम्प्ररुष्टा मन्त्रय़न्ति पराभवम् |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
यस्या मम मुखप्रेक्षा यूय़मिन्द्रसमाः सदा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
यस्या मम सपुत्राय़ास्त्वं नाथो मधुसूदन |
८७ क
आदि पर्व
अध्याय
१८९
व्यास उवाच
यस्या रूपं सोमसूर्यप्रकाशं; गन्धश्चाग्र्यः क्रोशमात्रात्प्रवाति ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
यस्या हि कृष्णौ पदवीं चरेतां; समास्थितावेकरथे सहाय़ौ |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ||
६९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
यस्यां दिशि प्रवृद्धाश्च कश्यपस्यात्मसम्भवाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
यस्यां दौहित्रजाँल्लोकानाशंसे पितृभिः सह |
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०६
सुपर्ण उवाच
यस्यां पूर्वं मतिर्जाता यय़ा व्याप्तमिदं जगत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७०
भीष्म उवाच
यस्यां भवन्ति भूतानि तद्विद्धि भरतर्षभ |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
यस्यां भवन्ति सेनाय़ां ध्रुवं तस्यां जय़ं वदेत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
यस्यां यस्यां दिशि ह्येते तां दिशं शरणं गतः |
३५ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
यस्यां यस्यामवस्थाय़ां यत्करोति शुभाशुभम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
यस्यां यस्यामवस्थाय़ां यत्करोति शुभाशुभम् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
यस्यां व्रह्म च सत्यं च यज्ञा लोकाश्च विष्ठिताः |
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
२००
युधिष्ठिर उवाच
यस्याः कामेन संमत्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४६
भीष्म उवाच
यस्याः किञ्चिन्नाददते ज्ञातय़ो न स विक्रय़ः ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
यस्याः क्षीरस्य धाराय़ा निपतन्त्या महीतले |
४ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
यस्याः पुरःसरा आसन्पृष्ठतश्चानुगामिनः |
२१ क
विराट पर्व
अध्याय
१९
द्रौपद्यु उवाच
यस्याः सागरपर्यन्ता पृथिवी वशवर्तिनी |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
यस्याङ्के क्रीडमानेन मय़ा वै परिवर्तितम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
देवय़ान्यु उवाच
यस्याङ्गिरा वृद्धतमः पितामहो; वृहस्पतिश्चापि पिता तपोधनः |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
यस्यात्मा विरतः पापात्कल्याणे च निवेशितः |
४५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
यस्यादिर्मध्यमन्तश्च सुरैरपि न गम्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यादेशेन तद्वित्तं व्यभजन्त द्विजातय़ः ||
१२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
यस्याद्य कर्म द्रक्ष्यसे मूढसत्त्व; शतक्रतोर्वा दैत्यसेनासु सङ्ख्ये |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
२४९
कोटिकाश्य उवाच
यस्यानुय़ात्रं ध्वजिनः प्रय़ान्ति; सौवीरका द्वादश राजपुत्राः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३०
श्रीभगवानु उवाच
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
यस्यान्तेऽभूत्सुमहान्दानवानां; दैतेय़ानां राक्षसानां च देवैः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३१
महेश्वर उवाच
यस्यान्नेनावशेषेण जठरे यो म्रिय़ेत वै |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
अर्जुन उवाच
यस्यापचारात्प्राप्तोऽय़मस्मान्क्लेशो दुरासदः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
यस्याभावे च भूतानामभावः स्यात्समन्ततः |
३७ क