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आदि पर्व
अध्याय ६७
शकुन्तलो उवाच
यदि धर्मपथस्त्वेष यदि चात्मा प्रभुर्मम |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
यदि धर्मस्त्वय़ा कार्यो यदि कार्यं प्रिय़ं च मे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
यदि धर्मे च ते वुद्धिर्मां चेज्जीवन्तमिच्छसि |
९९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४
शल्य उवाच
यदि न त्रास्यसि विभो करिष्यति स मां वशे |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
यदि न त्वं भवेन्नाथः फल्गुनस्य महारणे |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
यदि न रिपुभय़ात्पलाय़से; समरगतोऽद्य हतोऽसि सूतज ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
यदि न स्यान्न भूतानां कृपणो नाम कश्चन ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
यदि न स्युर्मनुष्येषु क्षमिणः पृथिवीसमाः |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
यदि नः सुकृतं किञ्चिद्यदि दत्तं हुतं यदि |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
यदि नात्मनि पुत्रेषु न चेत्पौत्रेषु नप्तृषु |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि नादास्यसे तात पश्चात्तप्स्यसि भारत ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
यदि नाम न युध्येरञ्शिक्षिता व्रह्मवन्धवः |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
यदि नाम ह्ययं युद्धे वरय़ेत्त्वां युधिष्ठिर |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
यदि नाराय़णास्त्रस्य प्रतिय़ोद्धा न विद्यते |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
यदि नाहं परित्याज्यो भवद्भ्यां पुरुषर्षभौ |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
यदि नाहं परित्याज्यो युवाभ्यामिह संय़ुगे |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
यदि नाहं विनाश्यस्ते यद्येवं रमसे मय़ा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
यदि निर्जित्य वः पार्थो वलाद्गच्छेत्स्वकं पुरम् |
११ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत्सारवद्धनम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
यदि नेच्छति मे दानं यथा दत्तमनेन वै |
९७ क
वन पर्व
अध्याय २८९
व्राह्मण उवाच
यदि नेच्छसि भद्रे त्वं वरं मत्तः शुचिस्मिते |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
यदि नैवाग्नय़ो व्रह्मन्मांसकामाभवन्पुरा |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
यदि नो जनय़ेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
यदि नो व्राह्मणास्तात सन्त्यजेय़ुरपूजिताः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि नोत्तिष्ठति जय़ः पिता मे भरतर्षभः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
यदि नोत्सहसे गन्तुं सरुजं त्वाभिलक्षय़े |
७८ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
यदि नोत्सहसे योद्धुं शत्रुभिः शत्रुकर्शन |
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि पर्याप्तं निर्यातय़ोपाध्याय़वाम्याविति ||
५५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३८
कुन्त्यु उवाच
यदि पापमपापं वा तदेतद्विवृतं मय़ा |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १०
व्यास उवाच
यदि पार्थिव कौरव्याञ्जीवमानानिहेच्छसि |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
यदि पार्थो रणे हन्यादद्य मामिह कर्हिचित् |
७३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
यदि पुंसां गतिर्व्रह्म कथञ्चिन्नोपपद्यते |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
यदि पुत्रं न पश्यामि यास्यामि यमसादनम् ||
३२ ग
आदि पर्व
अध्याय ९९
व्यास उवाच
यदि पुत्रः प्रदातव्यो मय़ा क्षिप्रमकालिकम् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
यदि पुत्रसमं शिष्यं गुरुर्हन्यादकारणे |
५० क
वन पर्व
अध्याय १०
सुरभिरु उवाच
यदि पुत्रसहस्रं मे सर्वत्र सममेव मे |
१६ क
वन पर्व
अध्याय २९१
पृथो उवाच
यदि पुत्रो भवेदेवं यथा वदसि गोपते ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
कुन्त्यु उवाच
यदि पुत्रो मम भवेत्त्वत्तः सर्वतमोपह |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
यदि प्रक्रीडितो देवैः सर्वैः सह शतक्रतुः ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
यदि प्रमाणं धर्मस्ते गृहस्थाश्रमसंमतः |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७९
सहदेव उवाच
यदि प्रशममिच्छेय़ुः कुरवः पाण्डवैः सह |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
कुण्डधार उवाच
यदि प्रसन्ना देवा मे भक्तोऽय़ं व्राह्मणो मम |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७९
भरद्वाज उवाच
यदि प्राणाय़ते वाय़ुर्वाय़ुरेव विचेष्टते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१४
भीष्म उवाच
यदि प्रीत उपाध्याय़ो धन्याः स्मो मुनिसत्तम ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
संवर्त उवाच
यदि प्रीतस्त्वमसि वै देवराज; तस्मात्स्वय़ं शाधि यज्ञे विधानम् |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय १५८
अर्जुन उवाच
यदि प्रीतेन वा दत्तं संशय़े जीवितस्य वा |
५२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
यदि प्रीतोऽसि भगवंस्ततो मे वद भार्गव |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ||
१२ ख