स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
यदुवाच महातेजा दिव्यचक्षुः प्रतापवान् ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
यदुश्च भरतश्रेष्ठ देवय़ान्याः सुतोऽभवत् |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
यदुसदनमुपेन्द्रपालितं; त्रिदिवमिवामरराजरक्षितम् |
६३ क
शल्य पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
यदूचतुर्मिथः पापौ तन्निवोध जनेश्वर ||
२१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
यदूनां परिशेषश्च वज्रो राजा कृतश्च ह ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
यदूर्ध्वं पादतलय़ोरवाङ्मूर्ध्नश्च पश्यति |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
यदृचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्वय़म् ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छोपगतास्तत्र राजानं परिमार्गिताः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
यदृच्छय़ा कामरागाज्जाता मेनकय़ा ह्यसि ||
७९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
यदृच्छय़ा च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा च तदहो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
यदृच्छय़ा चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा तौ मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ा द्रुमवतोर्महापर्वतय़ोरिव ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा धनुष्पाणिर्वद्धखड्गो वृकोदरः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
११
मैत्रेय़ उवाच
यदृच्छय़ा धर्मराजं दृष्टवान्काम्यके वने ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ा निपतितं चक्रमादित्यगोचरम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ा निपतितं भूमावङ्गारकं यथा ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ा भीमसेनं विरथं कृतवानसि ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तम |
८ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा मोक्षितोऽद्य तत्र का परिदेवना ||
४२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ा यथा चन्द्रश्च्युतः स्वर्गान्महीतले ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा विनाशं च शोकहर्षावनर्थकौ ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
यदृच्छय़ा समापेदे पुरं राजगृहं तदा ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ा सूर्यमिवावनिस्थं; दिदृक्षवः सम्परिवार्य तस्थुः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
यदृच्छय़ागतं तं तु वृक्षमूलमुपाश्रितम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
यदृच्छय़ागतं व्यासं पप्रच्छ भरतर्षभ ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
यदृच्छय़ाथ तद्रक्षः करे जग्राह लक्ष्मणम् |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
यदृच्छय़ानुव्रजता मय़ा राज्ञः कलेवरम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
यदृच्छय़ापि शङ्खोऽथ निष्क्रान्तोऽभवदाश्रमात् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४८
भीष्म उवाच
यदृच्छय़ाशान्तिपरो ददर्श भुवि नारदम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
यदृच्छय़ैव काष्ठेन सन्धिं गच्छेत केनचित् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
यदृच्छय़ोपसम्पन्नैर्यज्ञसाधुवहिष्कृतैः |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
यदेकं पाण्डवाः सर्वे न शेकुरभिवीक्षितुम् ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
यदेकं सहिताः पार्था न शेकुरतिवर्तितुम् ||
५४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
यदेकं सहिताः पार्था नात्यवर्तन्त भारत ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४१
धृतराष्ट्र उवाच
यदेकः पाण्डवान्क्रुद्धान्पुत्रगृद्धीनवारय़त् ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
यदेकः शिविरं सर्वमवधीन्नो गुरोः सुतः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
यदेकः समरे क्रुद्धस्त्रीन्रथान्पर्यवारय़त् ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
यदेकः समरे पार्थान्वारय़ामास सानुगान् ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
यदेकः समरे पार्थान्सानुगान्समय़ोधय़त् |
९१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
यदेकः समरे वीरस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
यदेकः समरे शूरान्सूतपुत्रः प्रतापवान् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
यदेकः समरे शूरो योधय़ामास वै वहून् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
यदेकः सर्वसैन्यानि पाण्डवानामय़ुध्यत ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
यदेकपातिनां सतां भवत्यमुत्र गच्छताम् |
६५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
यदेकरात्रेण करोति पापं; कृष्णं वर्णं व्राह्मणः सेवमानः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
यदेकविजय़े युद्धं पणितं कृतमीदृशम् |
११ ख