शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
येन यस्मिन्नधीकारे वर्तितव्यं पितामह ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
येन युक्तो जन्तुरय़ं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
येन यूय़ं गजप्रख्या निर्व्यूढा वारणावतात् ||
१५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
येन यूय़ं सुदुर्वृत्ता नृशंसा जातमन्यवः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
येन येन च तुष्येत नित्यमेव त्वय़ातिथिः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
येन येन प्रसरतो वाय़्वग्नी सहितौ वने |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७४
भीष्म उवाच
येन येन यथा यद्यत्पुरा कर्म समाचितम् |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
येन येन शरीरेण करोत्ययमनीश्वरः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
येन येन शरीरेण यद्यत्कर्म करोति यः |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
येन येन शरीरेण यद्यत्कर्म करोति यः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
येन येन शरीरेण यद्यत्कर्म करोत्ययम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
येन येन हि यस्यार्थः कारणेनेह कस्यचित् |
४३ क
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
येन येनाचरेद्धर्मं तस्मिन्गर्हा न विद्यते ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
येन येनैव हविषा व्राह्मणांस्तर्पय़ेन्नरः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
येन योगवलाज्जातः कुरुराजो युधिष्ठिरः |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
येन योत्स्ये महावाहुमर्जुनं जय़तां वरम् |
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
येन राजा महावीर्यः प्रविश्यान्तःपुरं पुरा |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
धृतराष्ट्र उवाच
येन रामादवाप्येह धनुर्वेदं महात्मना |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
येन रूपेण दैत्यस्तु येन वेषेण चैव ह |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
येन लिङ्गेन यो देशो युक्तः समुपलक्ष्यते |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
येन लोकत्रय़ं क्रोधात्त्रासितं स्वेन तेजसा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६
भीष्म उवाच
येन लोकास्त्रय़ः सृष्टा दैत्याः सर्वाश्च देवताः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
येन वर्षशतं साग्रमात्ममांसैर्हुतोऽनलः |
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
येन वा लभते कीर्तिं येन वा लभते श्रिय़म् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
येन वालः स सौभद्रो युद्धानामविशारदः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
१९०
मार्कण्डेय़ उवाच
येन विद्धो वामदेवः शय़ीत; सन्दश्यमानः श्वभिरार्तरूपः ||
७२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
येन विन्दामि वार्ष्णेय़ कश्मलं शोकतापितः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
येन विस्पर्धसे नित्यं यदर्थं घटसेऽनिशम् |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
येन वीरः कुरुक्षेत्रमभ्यरक्षत्परन्तपः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२११
भीष्म उवाच
येन वृत्तेन वृत्तज्ञः स जगाम महत्सुखम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
येन वृत्तेन वै तिष्ठन्न च्यवेय़ं स्वधर्मतः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
येन वेगवता रुग्णा रूक्षेणारुजता रसान् |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
येन वेदानधीते स्म पिवते सोममेव च |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
येन वै परमां पूजां कुर्वता मानितो ह्यसि |
८४ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
येन वैरं समुद्दीप्तं भूतान्तकरणं महत् ||
८१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
येन व्रह्मास्त्रविदुषा पाञ्चालाः सत्यजिन्मुखाः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
येन शक्यस्त्वय़ा मोक्षः प्राप्तुं श्रेय़ो यथा मय़ा ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
येन शक्रं रणे जित्वा तर्पितो हव्यवाहनः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
येन शक्रो दानवानां जघान नवतीर्नव |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
येन शान्तनवो भीष्मो द्रोणो विदुर एव च |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
युधिष्ठिर उवाच
येन संवर्धिता वाला येन स्म परिरक्षिताः ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
येन संशय़पूर्वेषु वोद्धव्येषु व्यवस्यति ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
येन संय़ाति लोकेषु शीतोष्णे विसृजन्रविः ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
येन सङ्कल्पितं चैव तन्मे शृणु जनाधिप ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
येन सङ्कल्पय़त्यर्थं किञ्चिद्भवति तन्मनः ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
येन सङ्गृह्णता तात रथमाधिरथेर्युधि |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान्स च पण्डितः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
येन सर्वमिदं वुद्धं प्रकृतिर्विकृतिश्च या |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
येन सर्वा दिशो राजन्पिवन्निव निरीक्षते |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
येन सर्वान्मृधे दैत्याञ्जघ्ने देवो महेश्वरः ||
१६ ख