कर्ण पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
रथं प्रमृद्य वेगेन धरणीमन्वपद्यत ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
रथं युक्त्वा हि दाशार्हो मिषतां सर्वधन्विनाम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
रथं रथं शतं चाश्वा देशजा हेममालिनः |
१०१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
रथं रथवरस्याजौ युक्तं लव्धोदकैर्हय़ैः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
रथं रथवरस्याजौ वानरर्षभलक्षणम् ||
११ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
रथं रथेन द्रोणस्य समासाद्य महारथः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
धृतराष्ट्र उवाच
रथं रथेन यो हन्यात्कुञ्जरं कुञ्जरेण च |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
रथं रथेन समरे पीडय़ित्वा महावलौ |
२६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
रथं रथेनाशु जगाम वेगा; त्किरीटिनः पुत्रवधाभितप्तः ||
६२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
रथं विशकलीकर्तुं समारव्धौ विशां पते ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
रथं शरीरं भूतानां सत्त्वमाहुस्तु सारथिम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
रथं श्वेतहय़ैर्युक्तं प्रेषय़ामास संय़ुगे ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
रथं श्वेतहय़ैर्युक्तमर्जुनो वाहय़िष्यति ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
रथं समावृत्य कुरुप्रवीरो; रणात्प्रदुद्राव यतो न पार्थः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
रथं समुत्सृज्य पदातिराजौ; प्रगृह्य खड्गं विमलं च चर्म |
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
रथं सम्पादय़ामास मेघगम्भीरनिस्वनम् ||
८१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५१
युधिष्ठिर उवाच
रथं सुभद्रामधिरोप्य भामिनीं; युधिष्ठिरस्यानुमते जनार्दनः |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
रथं सोपस्करं छत्रं शक्तिं खड्गं गदां ध्वजम् |
३५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वय़ुजमुत्तमम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
रथं हेमपरिष्कारं भीमान्तिकमुपानय़त् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
रथं हेममय़ं शुभ्रं सैन्यसुग्रीवय़ोजितम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
रथः प्रदुद्राव दिशः समुद्भ्रान्तहय़स्ततः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०२
व्याध उवाच
रथः शरीरं पुरुषस्य दृष्ट; मात्मा निय़न्तेन्द्रिय़ाण्याहुरश्वान् |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
रथः शरीरं पुरुषस्य राज; न्नात्मा निय़न्तेन्द्रिय़ाण्यस्य चाश्वाः |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८२
भीष्म उवाच
रथः शरैर्मे निचितः सर्वतोऽभू; त्तथा हय़ाः सारथिश्चैव राजन् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
रथक्षिप्तमहावप्रां पताकारुचिरद्रुमाम् ||
१२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
रथगोषश्च सञ्जग्मुः सेनय़ोरुभय़ोरपि ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
रथघोषं तु तं श्रुत्वा स्तनय़ित्नोरिवाम्वरे |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
रथघोषं तु तं श्रुत्वा हय़सङ्ग्रहणं च तत् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
रथघोषः स सङ्ग्रामे पाण्डवेय़स्य सम्वभौ |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
रथघोषश्च तुमुलो वादित्राणां च निस्वनः ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय
२२
द्रौपद्यु उवाच
रथघोषश्च वलवान्गन्धर्वाणां यशस्विनाम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
रथघोषेण महता नादय़न्वसुधातलम् |
५० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
रथघोषेण महता पूरय़न्तो वसुन्धराम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
रथचक्रं ततो गृह्य मुमोचाधिरथिं प्रति ||
१० ग
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
रथचक्रध्वजं वीरं घटोत्कचमुदावहन् ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
रथचक्रैर्युगैरक्षैरधिष्ठानैरुपस्करैः |
४५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
रथचर्यागतौ शूरौ शुशुभाते रणोत्कटौ ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
रथचर्यास्त्रमाय़ाभिर्मोहय़ित्वा परन्तपः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
रथचित्रां ज्योतिरथां विश्वामित्रां कपिञ्जलाम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
रथज्यातलनिर्ह्रादैर्वाणशङ्खरवैरपि |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
रथदन्तिगणा राजन्हय़ाश्चैव सुसज्जिताः |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
रथद्विपनराश्वैश्च सर्वतः पर्यवारय़न् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
रथद्विपा वाजिपदातय़ोऽपि वा; भ्रमन्ति नानाविधशस्त्रवेष्टिताः |
२८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
रथद्विरदपत्त्यश्वानेकः प्रमथसे वहून् |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
रथध्वजेभ्यश्च शरा निष्पेतुर्व्रह्मवादिनः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
रथनागह्रदोपेतां नानाभरणनीरजाम् ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वकलिलं पत्तिध्वजसमाकुलम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
रथनागाश्वकलिलं पदातिध्वजसङ्कुलम् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वकलिलं शङ्खदुन्दुभिनादितम् |
४ क