chevron_left  रथनागाश्वकलिलःarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वकलिलः पदात्यूर्मिसमाकुलः |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय २४०
वैशम्पाय़न उवाच
रथनागाश्वकलिलां पदातिजनसङ्कुलाम् ||
४१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वकलिलां पुरस्कृत्य तु वाहिनीम् |
७७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वकलिलां प्रगृहीतमहाय़ुधाम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वपत्तीनां दण्डधारेण वध्यताम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वपत्तीनां सादिनां च महाक्षय़े ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
रथनागाश्वमनुजानर्दय़न्निशितैः शरैः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
रथनीडाच्च यन्तारं भल्लेनापातय़त्क्षितौ ||
१९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
रथनीडानि देहांश्च हतानां गजवाजिनाम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
रथनेमिघोषस्तनितः शरशव्दातिवन्धुरः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिनिकृत्ताश्च गजैश्चैवावपोथिताः |
१२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिनिकृत्ताश्च निकृत्ता निशितैः शरैः |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
रथनेमिनिनादैश्च कम्पय़न्वसुधामिमाम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिनिनादैश्च वभूवाकुलिता मही ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
रथनेमिनिनादैश्च व्यवोध्यन्त सदा गृहे ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिसमुद्भूतं निःश्वासैश्चापि दन्तिनाम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिस्वनश्चात्र विमिश्रः श्रूय़ते महान् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
रथनेमिस्वनश्चैव घण्टाशव्दश्च भारत |
२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिस्वनाश्चैव श्रूय़न्ते लोमहर्षणाः ||
६२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
रथनेमिस्वनाश्चोग्राः सम्वभूवुर्जनाधिप ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
रथनेमिस्वनैश्चापि सनागवरवृंहितैः ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
रथनौभिर्नरव्याघ्राः प्रतेरुः सैन्यसागरम् ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
रथन्तरं द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
रथन्तरं यत्र वृहच्च गीय़ते; यत्र वेदी पुण्डरीकैः स्तृणोति |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
रथन्तरवृहत्यक्षस्तस्मै स्तोत्रात्मने नमः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
रथन्तरश्च तपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४४
सनत्सुजात उवाच
रथन्तरे वार्हते चापि राज; न्महाव्रते नैव दृश्येद्ध्रुवं तत् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
भीष्म उवाच
रथन्तरेण तं तत्र वसिष्ठः समवोधय़त् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
रथन्तरेण तं तात वसिष्ठः प्रत्यवोधय़त् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
रथन्तर्यां सुतान्पञ्च पञ्चभूतोपमांस्ततः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
रथपत्तिद्विपाश्चाश्वैर्नृभिश्चाश्वरथद्विपाः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
रथप्रभू रथध्वानः कुम्भरेताः स उच्यते ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
रथप्रवरमास्थाय़ नरो नाराय़णानुगः |
१८ क
शल्य पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
रथप्रवरमास्थाय़ सैन्धवाश्वं महारथः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
रथप्रवर्हं तुरगप्रवर्है; र्युक्तं प्रादान्मह्यमिदं हि रामः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
रथभङ्गो वभूवास्य धनुर्वाशीर्यतास्यतः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३७
सञ्जय़ उवाच
रथमण्डलमार्गेषु चरन्तावरिमर्दनौ |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
द्रोण उवाच
रथमन्यं समारुह्य धनञ्जय़मभीय़तुः ||
३६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
रथमन्यं समास्थाय़ पुत्रस्तव विशां पते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
रथमन्यं समास्थाय़ विधिवत्कल्पितं पुनः |
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
रथमन्यं समास्थाय़ विधिवत्कल्पितं पुनः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
रथमन्यं समास्थाय़ व्यूहद्वारमुपाय़यौ ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
रथमन्यं समास्थाय़ सद्यो विव्याध पाण्डवम् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
रथमन्वानय़त्तस्मै सुपर्णोच्छ्रितकेतनम् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
रथमश्वसमाय़ुक्तं दत्त्वाश्विन्यां नरोत्तमः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
रथमाक्षेपय़ामास गजेन गजय़ानवित् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
रथमादित्यसङ्काशमास्थितः कनकप्रभम् |
६४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
रथमारुरुहे वीरो धनञ्जय़शरार्दितः |
४७ ख