शान्ति पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
शृणु राजन्कथां दिव्यां सर्वपापप्रणाशिनीम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
शृणु राजन्कथां दिव्यामद्भुतामतिमानुषीम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्कुमारस्य रणे विक्रीडितं महत् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
शृणु राजन्कुलस्त्रीणां महाभाग्यं युधिष्ठिर |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नगस्त्यस्य माहात्म्यं व्राह्मणस्य ह ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्नवहितः श्रुत्वा चैवावधारय़ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितः सर्वमेतद्यथातथम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वृहदश्व उवाच
शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८०
नारद उवाच
शृणु राजन्नवहितो यथा भीष्मेण भारत |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्नवहितो यथा वृत्तो महान्क्षय़ः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
भीष्म उवाच
शृणु राजन्नवहितो वहुकारणविस्तरम् |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजन्निदं चित्रं पूर्वकल्पे यथातथम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१९४
मार्कण्डेय़ उवाच
शृणु राजन्निदं सर्वं यथावृत्तं नराधिप |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११९
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्निहोत्पत्तिं शैनेय़स्य यथा पुरा |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
शृणु राजन्नुतथ्यस्य जातस्याङ्गिरसे कुले ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्नेकमना वचनं व्रुवतो मम |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
शृणु राजन्पुरा वृत्तमितिहासं पुरातनम् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजन्पुरा सम्यङ्मय़ा द्वैपाय़नाच्छ्रुतम् |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तं नराधिप |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९४
भीष्म उवाच
शृणु राजन्मम रणे या शक्तिः परमा भवेत् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्मम वचो यत्त्वा वक्ष्यामि कौरव |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
भीष्म उवाच
शृणु राजन्महत्कर्म च्यवनस्य महात्मनः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्महाप्राज्ञ सङ्ग्रामं लोमहर्षणम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्यथा तस्य रथमन्यं महामतिः |
७७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
शृणु राजन्यथा दण्डः सम्भूतो लोकसङ्ग्रहः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्यथा दृष्टौ मय़ा कृष्णधनञ्जय़ौ |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजन्यथा भेदः कुरुपाण्डवय़ोरभूत् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
शृणु राजन्यथा राजा वीतहव्यो महाय़शाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
शृणु राजन्यथा वाक्यमुक्तो राजा सुय़ोधनः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्यथा वृत्तः सङ्ग्रामः कर्णभीमय़ोः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजन्यथाचष्ट फल्गुनस्य हरिर्विभुः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
शृणु राजन्यथातत्त्वं यथास्मि दुहिता मुनेः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्यथावृत्तं सङ्ग्रामं व्रुवतो मम |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
मन्त्रिण ऊचुः
शृणु राजन्यथास्माकं येनैतत्कथितं पुरा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्यदकरोत्तव सैन्येषु वीर्यवान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
शृणु राजन्वचो मह्यं यत्त्वां वक्ष्यामि कौरव |
३० क
आदि पर्व
अध्याय
१७३
गन्धर्व उवाच
शृणु राजन्वचो मह्यं यत्त्वां वक्ष्यामि सुव्रत ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
शृणु राजन्वसिष्ठस्य मुख्यं कर्म यशस्विनः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा तवैवापनय़ो महान् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा युद्धमेतत्सुदारुणम् |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
शृणु राजन्स्थिरो भूत्वा सङ्ग्रामं शंसतो मम ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु राजेन्द्र तत्त्वेन कीर्त्यमानं मय़ानघ |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४७
भीष्म उवाच
शृणु वक्ष्यामि ते प्राज्ञ सम्यक्त्वमनुपृच्छसि ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शृणु विस्तरतो राम यस्याय़ं पूर्वमाश्रमः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३२
जनक उवाच
शृणु वुद्धिं तु यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषय़ो मम ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शृणु व्यूहस्य रचनामर्जुनश्च यथा गतः |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
शृणु व्रह्मन्यथा पृष्टा मन्त्रिणो नृपतेस्तदा |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
शृणु शक्र प्रिय़ं वाक्यं यथा राजा दुरात्मवान् |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
शृणु शव्दान्वहुविधानर्जुनस्य रथं प्रति ||
५१ ख