शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षणार्थाय़ लोकस्य वधाय़ च सुरद्विषाम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
रक्षणार्थाय़ सम्भूता मेघत्वमुपय़ान्ति च ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
रक्षता स्कन्दराजस्य धर्षणां प्रभविष्णुना ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षते भृतकोऽरण्यं यथा स्यात्तादृगेव सः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षत्यपि च लोकोऽस्य प्रसादमभिवाञ्छति ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
रक्षत्यसुरराण्नित्यमिमं जनपदं वली ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
रक्षत्यस्मान्यथा राज्ञा रक्षितव्याः प्रजास्तथा ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
रक्षत्येव सुतं माता नान्यः पोष्टा विधानतः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
रक्षत्विदानीं सामात्यो यदि शक्नोषि पार्षतम् ||
३८ ख
विराट पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षध्वमपि चात्मानं व्यूहध्वं वाहिनीमपि |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
८
द्रौपद्यु उवाच
रक्षन्ति ते च मां नित्यं दुःखाचारा तथा न्वहम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षन्ति शतसाहस्राश्चित्राय़ुधपरिच्छदाः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
रक्षन्ति समरे प्राणान्कौरवा वा विशां पते ||
४६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
रक्षन्तीवाभिसंहत्य संहताङ्गा गिरिव्रजम् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
रक्षन्तु त्वा महावाहो सहितं द्विजसत्तमैः ||
११ ग
वन पर्व
अध्याय
२९२
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे समेषु विषमेषु च |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखावहम् |
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षन्ते ये च तद्द्रव्यं किङ्करा रौद्रदर्शनाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
रक्षन्नक्षय़िणं धर्मं व्रह्मण्यो गुरुपूजकः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
रक्षन्प्रजाः प्रजागर्ति नित्यं सुविहितोऽक्षरः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
रक्षन्प्रतिज्ञां च पुनर्भीमसेनकृतां पुरा |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षन्राष्ट्रं वुद्धिपूर्वं नय़ेन; सन्त्यक्तात्मा यज्ञशीलो महात्मा |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
रक्षमाणः कपोतं त्वं वहून्प्राणान्नशिष्यसि ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
रक्षमाणस्ततो भीष्मं तव पुत्रेण चोदितः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
रक्षमाणाः स्वकं व्यूहं द्रोणस्यापि च सैनिकाः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
रक्षमाणाश्च तं सङ्ख्ये ये मां योत्स्यन्ति केचन |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
रक्षमाणैर्जय़ं वीरैर्धर्मज्ञैरपि सात्वत ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
रक्षमाणो भय़ेभ्यस्त्वां चरिष्यामि त्वय़ा सह ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
युधिष्ठिर उवाच
रक्षसस्तस्य भगिनी किं नः क्रुद्धा करिष्यति ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
रक्षसा घोररूपेण प्रदुद्राव रणे भय़ात् ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
रक्षसा घोररूपेण वध्यमानस्य संय़ुगे ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
रक्षसा जानकी तस्य हृता भार्या वलीय़सा ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
रक्षसा तु गृहीतं तं विदित्वा स मुनिस्तदा |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
भीमसेन उवाच
रक्षसा निग्रहं प्राप्य रामस्य महिषी प्रिय़ा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
१६९
गन्धर्व उवाच
रक्षसा भक्षितस्तात तव तातो वनान्तरे ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
रक्षसा भीमसेनस्य कथमासीत्समागमः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
रक्षसा विप्रमुक्तस्तु कर्णोऽपि रथिनां वरः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६८
गन्धर्व उवाच
रक्षसा विप्रमुक्तोऽथ स नृपस्तद्वनं महत् |
६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
रक्षसां घोररूपाणां महतां क्रूरकर्मणाम् ||
१३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
रक्षसां घोररूपाणां महत्या सेनय़ा वृतः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
रक्षसां घोररूपाणामक्षौहिण्या समावृतः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७२
गन्धर्व उवाच
रक्षसां च समुच्छेद एष तात तपस्विनाम् |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
रक्षसां पुरुषादानां नदतां भैरवान्रवान् ||
४९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
रक्षसां पुरुषादानां मोदनं कुरराकुलम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
रक्षसामधिराजोऽहं दशग्रीवसमो वले ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
रक्षस्तु वाचा सम्पूज्य प्रश्नं पप्रच्छ तं द्विजम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
रक्षस्यात्मानमेवाग्रे तांश्च स्वेभ्यो मिथश्च तान् ||
५८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
रक्षां कृत्वात्मनः शूरा न्यस्य गुल्मान्यथाविधि |
५३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
रक्षां च परमां चक्रे देवराजान्महावलात् ||
४१ ख