आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
विधूतपाप्मा प्रविमुच्य वन्धनं; स सर्वलोकानमलान्समश्नुते ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
विधूतपाप्मा भवति वाजपेय़ं च विन्दति ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
विधूम इव दीप्तार्चिरादित्य इव दीप्तिमान् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
विधूम इव सप्तार्चिरादित्य इव रश्मिमान् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
विधूमं सार्चिषं कृष्णं कालसूर्यमिवोदितम् |
१३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
विधूमामिव संय़ान्तीमुल्कां प्रज्वलितामिव |
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
विधूमे न्यस्तमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३४
व्यास उवाच
विधूमे सन्नमुसले वानप्रस्थप्रतिश्रय़े |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
विधूमो दृश्यते राजंस्तथा पार्थो महारथः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
विधूय़ कलुषं सर्वं विरजाः संमतः सताम् |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
विधूय़ तं वाणगणं शरैः कनकभूषणैः |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
विधूय़ तद्वाणजालं वभौ तव सुतो वली ||
३५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
विधूय़ तान्वाणगणान्ये मुक्ताः पार्थिवोत्तमैः |
४५ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
विधूय़ वेणीं धावन्तमजानन्तोऽर्जुनं तदा |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
विधूय़ सर्वपापानि देवलोकं त्वमागता ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
विधूय़मानस्य महारणे मय़ा; गाण्डीवस्य श्रोष्यति मन्दवुद्धिः ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
विधूय़माना वातेन वहुरूपा इवाम्वुदाः ||
२० ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
विध्यन्तो मृगजातानि महेष्वासा महावलाः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१७५
वैशम्पाय़न उवाच
विध्यन्मृगाञ्शरैः शुद्धैश्चचार सुमहावलः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७७
धृष्टद्युम्न उवाच
विध्येत य इमं लक्ष्यं वरय़ेथाः शुभेऽद्य तम् ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
विध्वंसय़ंस्तद्रथिनामनीकं; ततोऽवहत्पाण्डवमाजिमध्ये ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
विध्वंसय़ामास रणे नरेन्द्र; वैकर्तनः शत्रुगणावमर्दी ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
विध्वंसय़ित्वा समरे धनुष्मा; न्गाण्डीवमुक्तैर्निशितैः पृषत्कैः |
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
विध्वंसय़िष्यन्ति रणे मा स्म तैः सह सङ्गमः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
विध्वस्तकलशं शून्यं गोमाय़ुवलसेवितम् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तचर्मकवचं प्रविद्धाय़ुधकार्मुकम् ||
६९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तचामरकुथान्विप्रकीर्णप्रकीर्णकान् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
विध्वस्तपर्णकमलां वित्रासितविहङ्गमाम् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तवन्धुरय़ुगान्विशस्ताय़ुधमण्डलान् |
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तवर्माभरणाम्वरस्र; ग्विचेष्टमानो भृशवेदनार्तः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तसर्वसंनाहान्वाणैश्चक्रेऽर्जुनस्त्वरन् ||
१० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्ता रथिनः सर्वे गजाश्च विनिपातिताः |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्ता हि रणे पार्थ सेनेय़ं भीमविक्रमात् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
विध्वस्तात्मा श्वसन्दीनो हा हेत्युक्त्वा सुदुःखितः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्ताय़ुधतूणीरान्समुन्मथितकेतनान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
विध्वस्तेऽथ पुरे तस्मिन्दानवेषु हतेषु च |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
विध्वस्तोऽय़ं हतामात्यो हतभ्राता हतप्रजः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
विनता चापि सिद्धार्था वभूव मुदिता तदा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
विनता चाव्रवीत्स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
मार्कण्डेय़ उवाच
विनता तु महारौद्रा कथ्यते शकुनिग्रहः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
२७
सूत उवाच
विनता नाम कल्याणी पुत्रकामा यशस्विनी ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
विनतां विषण्णवदनां कद्रूर्दास्ये न्ययोजय़त् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
विनतानिमित्तं पणिते दासभावाय़ पुत्रकाः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
३१
शौनक उवाच
विनताय़ास्त्वय़ा प्रोक्तं कारणं सूतनन्दन ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
विनदञ्शनकै राजंश्चकारास्योदकं प्रभुः ||
२१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विनदद्भिर्भृशाय़स्तैर्नराश्वद्विरदोत्तमैः |
१०७ क
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
विनदन्तं महानादं भिन्नभेरीसमस्वनम् |
६२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
विनदन्तः समापेतुः पुत्रस्य तव वाहिनीम् ||
२७ ख