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आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
नातिह्रस्वा न महती नीलोत्पलसुगन्धिनी |
९६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
नातीव ममृषे शल्यो भीमसेनस्य विक्रमम् |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
नातीवप्रीतमनसस्तेऽन्ववर्तन्त भारत ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
नातृप्यत्प्रेक्षमाणो वै तपोधनगणैर्युतम् ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
नातृप्यद्दर्शने तेषां विराटो वाहिनीपतिः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
नातृप्यन्पर्वतेन्द्रस्य दर्शनेन परन्तपाः ||
८८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७९
वसिष्ठ उवाच
नातो विशिष्टं लोकेषु भूतं भवितुमर्हति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
नात्मच्छन्देन भूतानां जीवितं मरणं तथा |
५० क
सभा पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
नात्मनात्मवतां मुख्य इय़ेष मधुसूदनः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
नात्मनोऽस्ति प्रिय़तरः पृथिव्यामनुसृत्य ह |
३१ क
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
नात्माधीनो मनुष्योऽय़ं कालं भवति कञ्चन |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ६०
वृहदश्व उवाच
नात्मानं शोचति तथा यथा शोचति नैषधम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
युधिष्ठिर उवाच
नात्मानमनुशोचामि नेमान्भ्रातॄन्महामुने |
१ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
नात्मानमनुशोचामि यथाहं पितरं शुभे |
९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
नात्मानमपरित्यज्य मृगय़ा नाम विद्यते |
१८ क
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
नात्मानमववुध्यामि मुह्यमानो मुहुर्मुहुः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
नात्मार्थं पाचय़ेदन्नं न वृथा घातय़ेत्पशून् |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३५
व्यास उवाच
नात्मार्थं पाचय़ेदन्नं न वृथा घातय़ेत्पशून् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
नात्यक्त्वा चाभय़ः शेते त्यक्त्वा सर्वं सुखी भव ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
नात्यक्त्वा जीवितं सङ्ख्ये शक्यो जेतुं युधिष्ठिरः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७०
भीष्म उवाच
नात्यक्त्वा सुखमाप्नोति नात्यक्त्वा विन्दते परम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नात्यन्तगुणवान्कश्चिन्न चाप्यत्यन्तनिर्गुणः |
५० क
वन पर्व
अध्याय २४५
वैशम्पाय़न उवाच
नात्यन्तमसुखं कश्चित्प्राप्नोति पुरुषर्षभ ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
नात्यन्तमेवानुवृत्तिः श्रूय़ते पुत्ररक्षणे ||
१८५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
नात्यर्थं पीडय़ामास पुत्रं वज्रधरात्मजः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
नात्यर्थमुपसेवेत श्रेय़सोऽर्थी परन्तप ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय १०३
वैशम्पाय़न उवाच
नात्यश्नीय़ां पतिमहमित्येवं कृतनिश्चय़ा ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
नात्याज्यमस्ति कृष्णस्य पाण्डवार्थे महीपते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
वैशम्पाय़न उवाच
नात्यासादय़ितव्यानि तेजांसि च तपांसि च ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
नात्याह किञ्चित्क्षमते विवादं; सर्वत्र तादृग्लभते प्रशंसाम् ||
९१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २८
श्रीभगवानु उवाच
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
नात्येति कारणं कार्यं न कार्यं कारणं तथा |
११ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
नात्र कण्टकिनः केचिन्नात्र केचिदपुष्पिताः |
६५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
नात्र कर्णी न नालीको न लिप्तो न च वस्तकः ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
नात्र किञ्चिन्मृषा वाक्यं यदुक्तं वो दिवौकसः |
१०७ क
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
नात्र दुःखं त्वय़ा राजन्कार्यं पार्थ कथञ्चन |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
नात्र दोषो मम मतः कथं वा मन्यसे विभो ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
नात्र प्लवं लभते पारगामी; महागाधे नौरिव सम्प्रणुन्ना |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८
शल्य उवाच
नात्र मन्युस्त्वय़ा कार्यो यत्क्लिष्टोऽसि महावने |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
शल्य उवाच
नात्र मन्युस्त्वय़ा कार्यो विधिर्हि वलवत्तरः ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नात्र मिथ्या वचः किञ्चित्सुहृत्त्वं नः परस्परम् ||
१४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
नात्र वाच्यं महाराज सुसूक्ष्ममपि विद्यते ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
व्रह्मो उवाच
नात्र शङ्का त्वय़ा कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते |
३४ क
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
नात्र शङ्का त्वय़ा कार्या सङ्गच्छ सह भार्यया ||
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
नात्र शेषं प्रपश्यामि सूतपुत्रे हते युधि ||
३८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
नात्र शोको भय़ं त्रासो नारतिर्नाय़शोऽभवत् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
नात्र स्वेषां परेषां वा विशेषः समजाय़त ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
नात्रसन्त रणे द्रोणात्सत्त्ववन्तो महारथाः ||
५९ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
नाथन्तः सर्वकामानां नास्तिका भिन्नसेतवः ||
२० ग