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कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
रराज समरे राजन्सपुष्प इव किंशुकः ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
रराज सा राजवती समृद्धा; ग्रहैरिव द्यौर्विमलैरुपेता ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
रराज सुभृशं भूमिः शान्तार्चिभिरिवानलैः ||
६१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
रराजातिभृशं भूमिर्विकीर्णैरिव पर्वतैः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
रराजातिरथः सङ्ख्ये जनार्दन इवापरः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
रराजोरसि वै सूर्यो ग्रहैरिव समावृतः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
ररास पृथिवी चैव भीष्मे शान्तनवे हते ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
विशोक उवाच
रविप्रभं वज्रनाभं क्षुरान्तं; पार्श्वे स्थितं पश्य जनार्दनस्य |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
रविरात्मप्रभां जह्यात्सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ||
२९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ||
१०७ ख
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
रविसोमाग्निवपुषां भीममासीत्तदा वपुः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
भीष्म उवाच
रविस्तु सन्तापय़ति लोकान्रश्मिभिरुल्वणैः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
रवेस्तमिस्रागमनिर्गमांस्ते; तथोदय़ं चास्तमय़ं च वीराः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
रश्मिग्राहश्च दाशार्हः सर्वलोकनमस्कृतः ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
रश्मिजालं महच्चन्द्रो मन्दं मन्दमवासृजत् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
रश्मिजालमिवादित्यस्तत्कालेन निय़च्छति |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
रश्मिजालैरिवार्कस्य विततैर्भरतर्षभ |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
रश्मिभिः सूर्यरश्म्याभैः सञ्जग्राह हय़ान्रणे |
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
रश्मिभिर्ज्ञानसम्भूतैर्यो गच्छति स वुद्धिमान् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
रश्मिभिर्भास्करो राजंस्तमसामिव भारत ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
रश्मिभिश्च समुद्यम्य जवेनाभ्यपतत्तदा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमिय़ेष सः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
रश्मिमन्तौ महात्मानौ दीप्तिमन्तौ महावलौ |
३२ क
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
रश्मिवती भास्वरा च दिव्यगन्धा मनोरमा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्निय़च्छति |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
रश्मीन्योक्त्राणि चाश्वानां कर्णो वैकर्तनोऽच्छिनत् ||
४४ ख
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
रश्मीन्समुत्सृज्य ततो महात्मा; रथादवप्लुत्य विराटपुत्रः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
रश्मीवतामिवादित्यो वीरुधामिव चन्द्रमाः |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
रष्किता समरे नित्यं नित्यं चापि हिते रतः |
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
रस एवाधिभूतं तु आपस्तत्राधिदैवतम् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
रसं गृद्ध्याभिभूता वै प्रशंसन्ति फलार्थिनः |
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
रसं च प्रति जिह्वाय़ाः प्रज्ञानं जाय़ते तथा |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
रसं स तं वै वर्षासु प्रवर्षति दिवाकरः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
रसः क्लेदश्च जिह्वा च त्रय़ो जलगुणाः स्मृताः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
रसज्ञः सर्वदुःखस्य यथात्मनि तथा परे ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ||
२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
रसज्ञानं तु वक्ष्यामि रसस्तु वहुधा स्मृतः ||
४३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
रसज्ञाने तु जिह्वेय़ं व्याहृते वाक्तथैव च |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
रसते व्यथते भूमिरनुष्टनति वाहनम् ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
रसनं चेन्द्रिय़ं जिह्वा रसश्चापां गुणो मतः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
रसने दर्शने घ्राणे श्रवणे च विशां पते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
भीष्म उवाच
रसप्रदाः कामदुघाश्च धेनवो; न दारुणा वाग्विचचार कस्यचित् ||
९२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७७
भीष्म उवाच
रसरत्नमय़ीं दद्यान्न स शोचेत्कृताकृते ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
रसवच्च प्रदास्यन्ति ते तोय़ं भृगुनन्दन |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
रसवच्च प्रभूतं च भक्ष्यभोज्यमरिन्दम ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
रसवत्पाय़यामासुः पानं मदसमीरिणम् ||
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
रसवन्ति च तोय़ानि शीतान्युष्णानि चैव ह ||
६ ख
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
रसवन्ति च धान्यानि गुणवन्ति फलानि च |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||
५९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||
१६ ख