chevron_left  राक्षसासुरसङ्घाश्चarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
राक्षसासुरसङ्घाश्च येऽनुजग्मुस्तमीश्वरम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
भीम उवाच
राक्षसास्तं न पश्यामि धनेश्वरमिहान्तिके |
८ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसास्तु पुलस्त्यस्य वानराः किंनरास्तथा |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १४९
कुन्त्यु उवाच
राक्षसाय़ च तत्सर्वं प्रापय़िष्यति भोजनम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
राक्षसाय़ सुसङ्क्रुद्धो माधवः परवीरहा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसी कामय़ामास रूपेणाप्रतिमं भुवि ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसीः प्रददौ तिस्रः पितुर्वै परिचारिकाः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसीभिः परिवृता वैदेही शोककर्शिता |
३० क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसीभिरुपास्यन्तीं समासीनां शिलातले |
२ क
वन पर्व
अध्याय २१४
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसीभिश्च सम्पूर्णमनेकैश्च मृगद्विजैः ||
११ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसे जीवमानेऽद्य रविरस्तमिय़ाद्यदि |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १४२
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसेन तथा भीमं क्लिश्यमानं निरीक्ष्य तु |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
राक्षसेन्द्रः सुवलवान्द्रौणिना रणमानिना ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
राक्षसेन्द्रस्ततस्तस्य धनुश्चिच्छेद भारत |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
राक्षसेन्द्रो महावाहुर्विनदन्भैरवं रवम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६५
भीष्म उवाच
राक्षसेभ्यः प्रमोदध्वमिष्टतो यात माचिरम् ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
राक्षसेष्वथ यक्षेषु नरेषु कुत एव तु ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय १५१
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसैः किंनरैश्चैव गुप्तां वैश्रवणेन च ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसैः सहितः सर्वैः पूर्वमेव गतः प्रभो ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसैरनुय़ातश्च लोमशेनाभिरक्षितः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसैर्निहतानां च वानराणां समुद्भवम् ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसो भीमसेनश्च विक्रमं चक्रतुः परम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३
नारद उवाच
राक्षसो लोहितग्रीवः कृष्णाङ्गो मेघवाहनः ||
१५ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीमहे वय़म् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
राक्षसो व्यनदद्घोरं स शव्दस्तुमुलोऽभवत् ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसोऽपि तदा भीमं युद्धार्थिनमवस्थितम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
राक्षसोऽस्य विरूपाक्षः सूतो दीप्तास्यकुण्डलः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
राक्षसौ भीमकर्माणौ हैडिम्वालम्वुसावुभौ |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५६
भीष्म उवाच
रागद्वेषप्रहीणस्य त्यागो भवति नान्यथा ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गताः |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
रागद्वेषविनिर्मुक्ता विचरन्तीह मोक्षिणः ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २४
श्रीभगवानु उवाच
रागद्वेषविय़ुक्तैस्तु विषय़ानिन्द्रिय़ैश्चरन् |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
रागद्वेषाभिभूतं च नरं द्रव्यवशानुगम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
रागद्वेषौ विवर्धेते ह्यनित्यत्वमपश्यतः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
रागमोहान्वितः सोऽन्ते कलुषां गतिमाप्नुते ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
रागवान्प्रकृतिं ह्येति विरक्तो ज्ञानवान्भवेत् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
रागशोकसमाविष्टं पञ्चस्रोतःसमावृतम् |
५१ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
रागात्क्रोधाद्भय़ाल्लोभाद्योऽर्थानीहेत मानवः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २०८
मार्कण्डेय़ उवाच
रागाद्रागेति यामाहुर्द्वितीय़ाङ्गिरसः सुता ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
रागाभिभूतः पुरुषः कामेन परिकृष्यते |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुव्धो हिंसात्मकोऽशुचिः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
रागी मुक्तः पचमानोऽऽत्महेतो; र्मूर्खो वक्ता नृपहीनं च राष्ट्रम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
रागे मोहे च सम्प्राप्ते क्वचित्सत्त्वं समाश्रितम् ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९०
भीष्म उवाच
रागेण जापको जप्यं कुरुते तत्र मोहितः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५३
भीष्म उवाच
रागो द्वेषस्तथा मोहो हर्षः शोकोऽभिमानिता |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
रागो योगस्तथा दाक्ष्यं नय़श्चेत्यर्थसाधकाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०७
गुरुरु उवाच
रागोत्पत्तौ चरेत्कृच्छ्रमह्नस्त्रिः प्रविशेदपः |
१३ क