chevron_left  राघवःarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ ||
६२ ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
राघवस्तस्य चेष्टाभिः सम्यक्च चरितेङ्गितैः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
राघवस्तु ससौमित्रिः सुग्रीवेणाभिपालितः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
राघवस्त्वभिनिर्याय़ व्यूढानीकं दशाननम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
राघवेण सह भ्रात्रा सीते त्वमचिरादिव ||
७१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७३
भीष्म उवाच
राघवोऽपि प्रिय़भ्रात्रे लक्ष्मणाय़ यशस्विने |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
राजंश्चराभिनवय़ा तन्वा यौवनगोचरः |
४१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
उत्तङ्क उवाच
राजंस्तथेह कर्तास्मि पुनरेष्यामि ते वशम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
राजंस्तव च दुर्धर्षो वैकुण्ठः पुरुषोत्तमः ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
राजंस्तावकसैन्यानां नोग्रं कश्चिदवारय़त् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
नकुल उवाच
राजंस्तित्तिरिकल्माषाञ्श्रीमाननिलरंहसः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
राजंस्तीर्थानि गन्तासि पुण्यानि भ्रातृभिः सह |
२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
राजंस्त्वं ह्यविधेय़ात्मा दुर्योधनवशे स्थितः ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
राजंस्त्वमनुजानीहि धैर्यमातिष्ठ चोत्तमम् |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय १
अर्जुन उवाच
राजंस्त्वमापदा क्लिष्टः किं करिष्यसि पाण्डव ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
राजंस्त्वामभय़ं याचे प्रभुं प्राणधनेश्वरम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
राजकार्याणि तत्रस्थः सर्वाण्येवाकरोच्च सः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
राजकिल्विषिणां तेषां भर्तृपिण्डापहारिणाम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
भीष्म उवाच
राजकोशस्य गोप्तारं राजकोशविलोपकाः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
राजञ्शतसहस्राणि तत्र तत्र तदा तदा |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
राजञ्शतसहस्राणि सोऽवधीत्कुरुनन्दन ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
द्रौपद्यु उवाच
राजञ्शिरसि तं कृत्वा जीवेय़मिति मे मतिः ||
२० ग
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
राजञ्शीलनिधिः स्फीतो दमय़न्त्या सुरक्षितः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४८
भीष्म उवाच
राजञ्शृणु समाख्यानमद्येदं वहुविस्तरम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १९८
वैशम्पाय़न उवाच
राजञ्शृणु सहामात्यः सपुत्रश्च वचो मम |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
राजतं कमलाक्षस्य विद्युन्मालिन आय़सम् ||
१८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
राजतं भाजनं हृत्वा कपोतः सम्प्रजाय़ते ||
९९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
राजतः पर्वतो यद्वत्त्रिभिः शृङ्गैः समन्वितः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
राजतेन महावाहुरुच्छ्रितेन महारथे |
४८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
राजतैश्च तथा कांस्यैः सौवर्णैश्चैव भूषणैः ||
१०६ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
राजत्वे तं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वव्रिरे ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
राजदण्डभय़ादेके पापाः पापं न कुर्वते |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
राजदारानुपादाय़ प्रय़युर्नगरं प्रति ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
राजदारानुपादाय़ प्रय़युर्नगरं प्रति ||
६८ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
राजदारानुपादाय़ व्यधावन्नगरं प्रति ||
७८ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
राजदारैः परिवृता गान्धारी च विनिर्ययौ ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
मुनिरु उवाच
राजदुर्गावतरणे नोपाय़ं पण्डिता विदुः ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
राजदोषेण हि जगत्स्पृश्यते जगतः स च ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
राजद्विष्टं न कर्तव्यमिति धर्मविदो विदुः |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३५
विदुर उवाच
राजद्विष्टं स्त्रीपुमांसोर्विवादं; वर्ज्यान्याहुर्यश्च पन्थाः प्रदुष्टः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
राजद्विष्टे च विप्रस्य विषय़ान्ते विसर्जनम् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
राजद्वेषाद्विनश्येय़ुर्नेमा राजन्प्रजाः पुनः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
राजधर्मं पुरस्कृत्य राजा राजानमृच्छति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२०
राजान ऊचुः
राजधर्मगुणोपेताः सर्वधर्मगुणान्विताः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
राजधर्मपरे नित्यं त्वय़ि क्रुद्धे युधिष्ठिर ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
राजधर्मविधानज्ञः प्रत्युवाच पुरन्दरम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
राजधर्मशरीरं च पक्षास्थिचरणोज्झितम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
राजधर्मस्य यन्मूलं श्लोकांश्चात्र निवोध मे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६७
भीष्म उवाच
राजधर्मा ततः प्राह प्रणिपत्य पुरन्दरम् |
११ क