वन पर्व
अध्याय
५६
वृहदश्व उवाच
राजन्पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्प्रकृतिमापन्नः कुरुराजो युधिष्ठिरः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्प्रतिगमिष्यामः शिवेन प्रतिनन्दिताः |
४४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
राजन्प्रतिग्रहो राज्ञो मध्वास्वादो विषोपमः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
राजन्प्रापुरमुं लोकं शरीराण्यवनिं यय़ुः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
राजन्प्राप्नुहि कामं त्वं यदि सर्वमिहेच्छसि ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
राजन्भूय़ो व्रवीमि त्वां पुत्रेषु सममाचर |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
राजन्मर्मसु मर्मज्ञो विद्ध्वा सुनिशितैः शरैः |
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
राजन्मा साहसं कार्षीः पुत्रान्न त्यक्तुमर्हसि |
२० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
राजन्मृत्युरनिष्टोऽय़ं भविता ते वृथाग्निना ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२९
भीष्म उवाच
राजन्यत्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
राजन्यसति लोकस्य कुतो भार्या कुतो धनम् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
राजन्या राजकन्याश्चाप्यानय़न्त्वभिषेचनम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
राजन्येव परा गुप्तिः कार्या सर्वात्मना त्वय़ा ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७३
वाय़ुरु उवाच
राजन्येवास्य धर्मस्य योगक्षेमः प्रतिष्ठितः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
राजन्यो व्राह्मणं राजन्पुरा परिचचार ह |
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
राजन्वलेन द्व्यङ्गेन त्यक्त्वा जीवितमात्मनः ||
४६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
राजन्वहुमतश्चासि त्रैलोक्यस्यापि सत्तमः |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्वाक्यं जनस्यास्य मय़ि सर्वं समर्पितम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्विदितधर्मोऽसि न तेऽस्त्यविदितं भुवि |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्विदितधर्मोऽसि सुनिर्णीतार्थसंशय़ः |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
राजन्विदितमेतत्ते यथा गाण्डीवधन्वनः |
१०७ क
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्विद्वान्भवान्दान्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रिय़ः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
राजन्विशेषो नास्त्यत्र वर्णय़ोरुभय़ोरपि ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
राजन्विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
राजन्वृहस्पतिर्नाम तस्याप्यङ्गिरसः सुतः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
राजन्वैकर्तनो भीमं क्रुद्धः क्रुद्धमरिन्दमम् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१८३
मार्कण्डेय़ उवाच
राजन्वैन्य त्वमीशश्च भुवि त्वं प्रथमो नृपः |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
राजन्व्यसृजदुग्राणि शरवर्षाणि संय़ुगे ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
राजन्व्रूय़ाः सुतं मे त्वमश्वत्थामानमाहवे |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
राजन्स राज्ञा भर्तव्य इति धर्मविदो विदुः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्संशय़िते मोक्षे परतन्त्रेषु देहिषु ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् |
७६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
राजन्सङ्ग्राममाश्चर्यं तव पुत्रस्य भारत |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७१
सञ्जय़ उवाच
राजन्सङ्ग्राममाश्चर्यं शृणु कीर्तय़तो मम |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
राजन्सत्त्वमय़ो ह्येष तमोरागविवर्जितः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
राजन्सत्यं परं व्रह्म सत्यं च समय़ः परः |
२५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्सप्त सरस्वत्यो याभिर्व्याप्तमिदं जगत् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
राजन्सम्प्राप्तविद्यास्ते कुमराः कुरुसत्तम |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
राजन्सम्यग्जितानीह पञ्च पञ्चसु यत्त्वय़ा |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
राजन्सर्षपमात्राणि परच्छिद्राणि पश्यसि |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
राजन्सुवहवो द्वीपा यैरिदं सन्ततं जगत् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
राजन्सेनापतिर्जातः शिशुपालः प्रतापवान् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
राजन्सेनासमुद्योगो रथनागाश्वपत्तिमान् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
राजपिण्डभय़ादेते यदि हास्यन्ति जीवितम् |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
राजपुत्र न ते कोपं करोमि विदिता हि मे |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्तं पलाय़नम् |
५८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
राजपुत्र प्रत्यवेक्ष समानीतानि सर्वशः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
राजपुत्र हितप्रेप्सुः क्षिप्रं निर्याहि वै स्वय़म् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
राजपुत्रं हतं दृष्ट्वा निरमित्रं महावलम् ||
२९ ख